Saturday, September 19, 2020

शिक्षा नीति 2020 : मेरी नजऱ | Education Policy 2020 : My Views

 



शिक्षा नीति 2020 : मेरी नजऱ


शिक्षा नीति वो शैक्षिक दिशा निर्देश हैं, जो भारत सरकार द्वारा घोषित किये जाते हैं। इस नीति के द्वारा सरकार देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा निर्धारित करती है। शिक्षा नीति में उन सभी विषयों का उल्लेख होता है, जो सरकार के अनुसार देश की शिक्षा व्यवस्था के सुधार और उन्नति के लिए आवश्यक हैं।


महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षा नीति में दिए गए दिशा निर्देश संवैधानिक दृष्टि से सिद्धांत के रूप में तो देखे जा सकते हैं, परंतु इसके अतिरिक्त यह स्वयं में कोई अधिकार नही रखते और इस कारण सरकार इन्हें प्रवत्त करने के लिए संवैधानिक एवं न्यायिक दृष्टि से बाध्य नहीं है।


2020 में घोषित शिक्षा नीति स्वतन्त्र भारत के इतिहास में आयी तीसरी बड़ी शिक्षा नीति है।


भारत की प्रथम शिक्षा नीति सन 1968 में कोठारी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित की गई थी। उस शिक्षा नीति का रुझान सभी को एक समान शिक्षा अवसर देने और 14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने पर था। उस समय यह दोनों ही दिशा निर्देश भारतीय एकता और अखंडता के लिए आवश्यक थे।


भारत की दूसरी शिक्षा नीति सन 1986 में श्री राजीव गांधी द्वारा लायी गई थी। उस शिक्षा नीति का केंद्र शिक्षा के अधिकार को गरीब, पिछड़ों, दलितों इत्यादि तक पंहुचाना था। उस नीति में पहली बार छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, और जो नागरिक आर्थिक समस्याओं के चलते बच्चों को विद्यालय भेजने में असमर्थ हैं उनके लिए प्रोत्साहन राशि कि बात की गई थी। इसके अतिरिक्त शिक्षा नीति में पहली बार स्वतंत्र शिक्षा संस्थानों की भी बात भी की गई थी। शिक्षा व्यवस्था को सुदृण करने के लिए देश की जीडीपी का 6% प्रतिवर्ष शिक्षा बजट के लिए आरक्षित करने का उल्लेख भी शिक्षा नीति में था।


सन 1992 में श्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में दूसरी शिक्षा नीति में कुछ संशोधन किये गए।


अब 28 वर्ष के एक बड़े अंतराल के बाद भारत की तीसरी शिक्षा नीति श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लाई गई है। 2020 में आई शिक्षा नीति के प्रमुख दिशा निर्देश इस प्रकार हैं :


1) शिक्षा के अनिवार्य अधिकार(RTE) को 6 से 14 वर्ष की आयु से बढ़ाकर 3 से 18 वर्ष करने का उल्लेख

2) प्रारंभिक बाल शिक्षा व्यवस्था और देखभाल पर ज़ोर

3) छात्र शिक्षा के प्रथम पाँच वर्ष तक मातृभाषा के आधार पर शिक्षा देने पर टिप्पणी

4) विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के विघटन की आवश्यकता पर बल

5) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एमफिल को रद्द करने की बात

6) उच्च शिक्षा में बहु विकास विकल्प की आवश्यकता पर ज़ोर

7) शिक्षा प्रणाली के मूलभूत ढांचे को 10+2 से 5+3+3+4 में बदलने का उल्लेख

8) शिक्षा में क्रिटिकल थिंकिंग के प्रयोग-प्रसार पर टिप्पणी

9) शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता रखनें और शिक्षा मित्रों अथवा अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक लगाने की बात

10) विभिन्न विद्यालयों में सीमित संसाधनों के साझा प्रयोग की आवश्यकता पर ज़ोर

11) शिक्षा नीति में सरकार ने छात्रों के विद्यालय छोड़ने के प्रतिशत को लेकर चिंता जताई एवं उचित क़दम उठाकर आगामी 10 वर्षों में 100% बच्चों को माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करवाने के लक्ष्य की बात रखी

12) एक नए राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के गठन की आवश्यकता का भी उल्लेख किया गया

13) जीडीपी के 6% को शिक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आरक्षित करने की बात भी की गई



शिक्षा नीति में आये कुछ नए दिशा निर्देश और मेरे विचार :


1) प्रारंभिक बाल शिक्षा व्यवस्था और देखभाल : मानव मस्तिष्क का अधिकांश विकास 7-8 वर्ष की आयु तक हो जाता है, इसकी आवश्यकता समझते हुए सरकार ने शिक्षा नीति में निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा पर बल दिया है। मेरे विचार में यह एक उत्तम कदम है।


2) शिक्षा प्रणाली के मूलभूत ढांचे को 10+2 से 5+3+3+4 बदलने का उल्लेख : यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि मनुष्य जीवन में कई चरण हैं और शिक्षा भी उसी आधार पर होनी चाहिए, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में प्रयुक्त 10+2 मेरे विचार में उपयुक्त नहीं है।


3) शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता : यह एक उचित बात है, इस प्रकार दोषपूर्ण सरकारी तंत्र की वजह से हो रहे शिक्षकों के शोषण पर रोक लगेगी और अच्छे शिक्षकों को उचित अवसर भी प्राप्त होंगे, इसके चलते समय के साथ शिक्षा स्तर में भी सुधार होगा।


4) उच्च शिक्षा में बहुविकास विकल्प की आवश्यकता पर ज़ोर : यह एक अच्छा कदम है क्योंकि आर्थिक समस्याओं के चलते बहुत से विद्यार्थी उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश तो लेते हैं पर उन्हें पूरा नहीं कर पाते, इस स्थिति में समय और शिक्षा को महत्व देते हुए 1 वर्ष में सर्टिफिकेट, 2 वर्ष में डिप्लोमा और तीन वर्ष में डिग्री देने की बात की गई है।


5) विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के विघटन की आवश्यकता पर बल : मेरे विचार में किसी भी संस्थान को शिक्षा क्षेत्र में सभी अधिकार देना ठीक नही है, इस कारण ऐसी संस्थाओं का विघटन शिक्षा स्तर में सुधार के लिए आवश्यक है।



दिशा निर्देशों को लेकर उठ रहे विवाद और असमंजस की स्थिति :


1) प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा के आधार पर हो : इस दिशा निर्देश को लेकर जनता में असमंजस की स्थिति बनी हुई है, कुछ लोग इसे नई दिशा में उत्तम कदम बता रहे हैं तो कुछ इसे वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को अशक्त करने की कोशिश कह रहे हैं।


मेरे विचार में शिक्षार्थी आधार के लिए प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, सत्य यह भी है की इस दिशा निर्देश में कुछ नया नहीं है और इसका उल्लेख हमें पिछली दोनों शिक्षा नीतियों में भी मिलता है।


2) शिक्षा में क्रिटिकल थिंकिंग का प्रयोग प्रसार : इस दिशा निर्देश में भी लोगों का मत बटा दिखायी देता है, मेरे विचार में इस विषय पर केवल टिप्पणी मात्र कर देने से, शिक्षा क्षेत्र में क्रिटिकल थिंकिंग के प्रयोग-प्रसार में सहायता नहीं होगी, यह अति आवश्यक विषय है और सरकार को मार्गदर्शन हेतु गहन दिशा निर्देश देने चाहिए थे परंतु नई शिक्षा नीति में इसका अभाव प्रतीत होता है।


3) जीडीपी के 6% को शिक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आरक्षित करने का उल्लेख : इस दिशा निर्देश को लेकर जनमानस अति उत्साहित प्रतीत हो रहा है क्योंकि वर्तमान में जीडीपी का लगभग 4% ही शिक्षा के लिये प्रयोग होता है।


मेरे विचार में यह अच्छा कदम है परंतु नया नहीं, स्वतंत्र भारत में आई सभी शिक्षा नीतियों के दिशा निर्देशों में जीडीपी का 6% शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग हो इसका उल्लेख मिलता है।


4) विभिन्न विद्यालयों में सीमित संसाधनों के साझा प्रयोग की आवश्यकता पर ज़ोर : इस दिशा निर्देश को लेकर भी बुद्धिजीवी बटे हुए प्रतीत होते हैं, एक पक्ष के अनुसार कुछ संसाधन नहीं होने से साझा संसाधन होने बेहतर हैं। परंतु इसके साथ यह संदेह भी जताया जा रहा है की इस नीति की आड़ में सरकार अपने उत्तरदायित्व से पीछे हट रही है और यदि इस प्रकार संसाधनों को प्रयोग में लाया गया तो संभवतः वो किसी के लिए भी लाभप्रद नहीं रह पायेंगे।


5) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एमफिल को रद्द करने की बात : इस दिशा निर्देश को लेकर शिक्षित वर्ग बटा हुआ है, एक वर्ग रिसर्च के आधार के रूप में इसे देखता है और दूसरा इसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रहा है।


मेरे विचार में जो छात्र एमफिल करते हैं, उनका गंतव्य भी पीएचडी ही होता है। इस आधार पर देखें तो एमफिल की अलग से कोई विशेष आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है।



मंशा को लेकर संशय :


1) शिक्षा नीति में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग(EWS) को लेकर निर्देशों के विषय में पूर्णतः चुप्पी साधी गई है। यह शांति इस कानून को अशक्त करने की दिशा में संकेत देती प्रतीत होती है।


2) नई नीति में शिक्षा के क्षेत्र में असमानताओं को कम करने की दिशा में कोई ठोस निर्देश नहीं मिलते, अर्थात पिछड़ा वर्ग के शिक्षा स्तर सुधार की दिशा में कोई उपरोक्त कदम लेती यह नीति प्रतीत नहीं होती है।


3) यूपीए सरकार के कार्यकाल में शिक्षा के अनिवार्य अधिकार(RTE) के अंतर्गत, शिक्षा स्तर उत्थान के लिए 2009 में कुछ कारगर नीतियाँ लायी गईं थी, नई नीति आवरण में तो पुरानी नीति का विस्तार लगती है परंतु यदि गहनता से देखें तो कुछ निर्देश अधिकार को निःशक्त करने की दिशा में संदेह भी उत्पन्न करते हैं।



मेरा अवलोकन और विचार :


मेरी दृष्टि में नई शिक्षा नीति को लेकर न हमें अति उत्साहित होने की आवश्यकता है और न ही निरुत्साहित होने की, आवश्यकता है तो केवल इसे समझने की और सम्पूर्णता में इसका अवलोकन करने की।


मैंने प्रारंभ में कहा शिक्षा नीति शिक्षा की दिशा में केवल दिशा निर्देश हैं और यह अपने आप में कोई संवैधानिक या न्यायिक अधिकार नहीं रखते। तो प्रत्येक सरकार नीतियाँ तो बहुत उत्तम बनाती है पर किसी कानूनी या संवैधानिक बाध्यता के न होते, इन्हें प्रयुक्त केवल कुछ अंशों में करती है और वह भी केवल अपनी आवश्यकता और राजनैतिक रुझान के अनुसार।


भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो शिक्षा नीति के केवल 15%-20% दिशा निर्देश ही किसी कानून या संविधानिक अधिकार में परिवर्तित हो पाते हैं और वो अधिकार ही  वास्तविक रूप में शिक्षा व्यवस्था का स्तर औऱ दिशा निर्धारित करने में उपयोगी होते हैं।


मेरे विचार में नई शिक्षा नीति उत्तम है परंतु इससे पहले आई शिक्षा नीतियाँ भी अपने समय और आवश्यकताओं के अनुसार श्रेष्ट थीं। अतः देखना यह है की सरकार की कथनी और करनी में कितना समन्वय या भिन्नता हमें देखने को मिलती हैं क्योंकि अंत मे वही मंशा हमारी शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा तय करेगी।


--विव 
(विवेक शुक्ला)

Sunday, September 13, 2020

धर्म क्या है ? | Dharm kya hai ?





 धर्म क्या है?


धर्म एक संस्कृत शब्द है, इसका शाब्दिक अर्थ है "धारण करने योग्य", अर्थात् सभी गुण जो मानवता के मूल सिद्धान्तों के अनुकूल धारण करने योग्य हों, वो धर्म हैं।

परंतु, धर्म का अर्थ जितना सरल है इसकी विवेचना उतनी ही जटिल।

अब प्रश्न यह उठता है कि मानवता के सिद्धांतों के अनुकूल धारण करने योग्य गुण क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें वेदों में मिलता है, जिनके अनुसार सत्य, अहिंसा, शांति, न्याय इत्यादि मानवता के प्रमुख गुण है।

धर्म की संकल्पना इतनी व्यापक है कि इसका कोई भी पर्यायवाची हमें किसी दूसरी भाषा में देखने को नहीं मिलता। इंग्लिश शब्द रेलीजन अर्थात आस्था एवं विश्वास, हिंदी शब्द सम्प्रदाय और उर्दू शब्द मज़हब अर्थात् एक प्रकार की परंपरा और विचारधारा को मानने वाला समुदाय। शाब्दिक विवशताओं के चलते प्रयोग में तो हैं, परंतु यह सभी धर्म को परिभाषित करने में असमर्थ हैं।

साधारण धारणा के विपरीत हिंदू, सिख, मुस्लिम, ईसाई सभी धर्म न होकर केवल सम्प्रदाय हैं, क्योंकि इनका स्रोत वेदों से पृथक एक पारंपरिक विचारधारा है। एक अपवाद सनातन धर्म है जिसका उद्गम वेद और उपनिषद एवं लक्ष्य जन कल्याण है, अतः इसे धर्म कहना असत्य नहीं है।


वेदों एवं पुराणों में धर्म का मानवीय चित्रण भी मिलता है जो धर्म को परिभाषित करने में सहायक है, जिसके अनुसार धर्म और अधर्म दोनों ही ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं।

अधर्म की पत्नी हिंसा हैं और नर्क एवं भय अधर्म के प्रपौत्र हैं।

धर्म की पत्नी अहिंसा हैं और विष्णु धर्म के पुत्र हैं। इसी कारण, श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं:

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थात् जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब मैं धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेता हूँ।

सनातन धर्म में पुरुषार्थ के चार स्तंभ बताए गए हैं, धर्म, काम, अर्थ एवं मोक्ष, जिनमें धर्म श्रेष्ठ है। सनातन में धर्म के दस लक्षणों का भी उल्लेख मिलता है जिनमें सत्य, क्षमा, दम, विद्या, अक्रोध आदि प्रमुख हैं।

धर्म विस्तृत है परंतु इसका मार्ग सदा शांति, अहिंसा और उन्नति का मार्ग एवं लक्ष्य जन कल्याण रहा है।

जो सम्प्रदाय को धर्म कहता है वह ज्ञानी है और जो धर्म को विध्वंश का कारक मानता है वो महामूर्ख है।


आज के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो ज्ञान के अभाव में धर्म-धर्म न रहकर कुछ अति महत्वकांक्षी विचारधाराओं की लक्ष्य पूर्ति का साधन मात्र रह गया है।

विभिन्न संप्रदाय आत्मकेंद्रित लोलुपताओं के चलते, अनीति का प्रयोग हिंसा, द्वेष, और विघटन के प्रसार हेतु कर रहें हैं और इसे धर्म का मार्ग कह अपनें समुदायों को भ्रमित भी कर रहें हैं।

विद्या के अभाव में जन-साधारण इस धार्मिक एवं राजनीतिक षड्यंत्र को समझने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है। भारत में, अज्ञानता के रहते सम्प्रदायिक महत्वकांक्षाओं को धर्म मान प्रतिवर्ष हज़ारों निर्दोष साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं।

इस सृष्टि को आवश्यकता है ज्ञान की, धर्म की, सम्प्रदाय की नहीं। धर्म कहता है, जो अपने अनुकूल न हो ऐसा व्यवहार दूसरों से नहीं करना चाहिए। सम्प्रदाय इसके विपरीत अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति हेतु दूसरों का अहित करने में भी संकोच नहीं करता।

बीसवीं शताब्दी में भी, हम उन्हीं पुरानी साम्प्रदायिक कुरीतियों और मान्यताओं में, उलझे हुए हैं। आज मानव धर्म का नाश कर, साम्प्रदायिक ईश्वर की रक्षा हेतु तत्पर है।

श्री कृष्ण महाभारत में कहते हैं:

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।

अर्थात् जो धर्म को मारता है, धर्म उसका नाश कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है।

जो धर्म नहीं है वो अधर्म है, शाश्वत धर्म के लक्षण अहिंसा, विद्या, क्षमा और शांति हैं। सांप्रदायिक स्वार्थ हेतु हिंसा, क्रोध, असत्य और अमैत्री अधर्म है।

धर्म का यह क्षय विश्व प्रगति में रोधक है, जो उन्नति जन-कल्याण हेतु न हो वो अवनति है।

अधिकांश जन-साधारण, अज्ञानता एवं स्वार्थ के वशीभूत हो धर्म की हो रही हानि के लिए उत्तरदायी हैं। शेष जो ज्ञानी हैं परंतु मौन हैं, उनका अपराध और भीषण है। 

श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे

अर्थात्  गुणीजन की रक्षा के लिये और पाप कर्म करनेवाले दुष्टों का नाश करने के लिये एवं धर्म की स्थापना के लिये मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।

स्मरण रहे, ईश्वर का एक रूप प्रकर्ति भी है और उसका कोप कितना भयावह होता है, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। फैलती महामारी, ग्लोबल-वार्मिंग, निरंतर आते भूकंप इत्यादि, प्रकर्ति के क्रोध का जीवंत स्वरूप हैं। धर्म से विमुख हो जो व्यक्ति सांप्रदायिक आस्थाओं का चयन करता है प्रकर्ति उसका विनाश कर देती है।

मेरे विचार में, हमें सदा आशावादी रहना चाहिए, यही जीव आधार है, आरंभ कहीं से भी हो सकता है, आवश्यकता है तो महत्वकांशाओं और स्वार्थ से ऊपर उठ धर्म का उद्देश्य समझने की और उसका पालन करने की।

अंत में प्रश्न वही है, धर्म क्या है? मेरे अनुसार उत्तर भी सरल है, जो गुण जन कल्याण हेतु धारण करने योग्य हो, धर्म है...



--विव
(विवेक शुक्ला)

Sunday, September 6, 2020

शिक्षा प्रणाली में विद्या का अभाव | Shiksha Pranali Mein Vidya Ka Abhav




शिक्षा प्रणाली में विद्या का अभाव | Shiksha Pranali Mein Vidya Ka Abhav 




शिक्षित होना हमारे व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है, छात्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा इस दिशा की ओर संकेत भी देती है। सारांश में कहें तो शिक्षा प्रणाली के अनुसार अंक प्रतिशत छात्रों की विद्वता का सूचक है और यही वो मानक है जो छात्रों के भविष्य को रेखांकित करता है।

परंतु क्या यह मानक सच में विद्वता को रेखांकित करने में समर्थ है? यदि है, तो प्रतिवर्ष छात्र आत्महत्याओं में बढ़ता प्रतिशत किस ओर संकेत दे रहा है। यदि नही, तो क्या यह कोई भ्रम है जो छात्रों को चिंता का मार्ग दिखा जीवन राह से भटका रहा है? इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत जटिल है।
 
एक प्रश्न और है, वह सत्य में आपको विचलित कर सकता है कि हमारे शिक्षण स्थानों में शिक्षा का तो स्तर है पर क्या विद्या का भी कोई स्थान है?
 
यदि है, तो मूलतः उसका कोई प्रतिबिंब हमें आजकल बच्चों के आचरण में क्यों नहीं दिखता। यदि नहीं, तो हम शिक्षालय को विद्यालय कह कर अपनी अज्ञानता का प्रसार क्यों करते हैं। हम शिक्षित जनों को विद्वान कहने में संकोच क्यों नही करते और यदि वो विद्वान हैं तो विद्वता कहाँ है?
 
समस्या का समाधान करना है तो सर्वप्रथम समस्या को पूर्णतः समझना आवश्यक है। बिना परिप्रेक्ष्य समझें हम निवारण हेतु प्रयत्नशील नहीं रह सकते यह मानव प्रवृत्ति है।
 
मूल प्रश्न यह है कि शिक्षा क्या है? यदि यह विद्या नहीं तो विद्या क्या है? और यदि, साधारण जीवन में शिक्षा का अभाव नहीं है तो विद्या का बोध और अनुसरण क्यों आवश्यक है?
 
शिक्षा को यदि हम परिभाषित करें तो यह लिखित एवं भौतिक ज्ञान है, यह वो प्रतिलिपि अथवा जानकारी है जिसका अनुसरण कर हम और हमारी सभ्यता आधुनिक उन्नति और प्रगति की दिशा में निरंतर बढ़ती है। भारतवर्ष में होती उन्नति एवं प्रगति हमारे बीच में बढ़ते शिक्षा स्तर का परिचायक है।
 
हमारे समाज में अधिकांश जनों के लिए यह उन्नति ही जीवन आधार है, उनके लिए ये ही मानवता और सभ्यता के निरंतर अग्रसर होने का सूचक भी है। तो फ़िर, विद्या का स्थान ही कहाँ रह जाता है, यदि इसकी आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती है?
 
हम शायद यह भूल जाते हैं कि यदि शब्द ज्ञान ही मानवता का परिचायक होता तो इस सृष्टि को कभी विद्वता की आवश्यकता ही न पड़ी होती।
 
विद्या को यदि हम परिभाषित करें तो पायेंगे कि यह जीव मुक्ति का आधार है। इस के आभाव में सदाचार, मानवीय कर्तव्यों, आत्मबोध, संस्कार, जीवन के उद्देश्य, सही गलत के मध्य भेद कर पाना संभव ही नहीं।

शिक्षा हमें प्रगति और जिज्ञासा तो देती है, परंतु चिंता, अहंकार और तामस प्रवृत्तियों से भी भर देती है। विद्या मन को स्थिर रख मुक्ति की राह उद्घोषित करती विभा है, यह चिंता, अंधविश्वास और अहंकार को हर लेती है।
 
यह अपने प्रकाश से मनुष्य के भीतर नव ऊर्जा का संचार और जीवन के उद्देश्य के प्रति जागरूकता का बीज रोपित भी करती है। विद्या के अभाव में मनुष्य किसी भी ज्ञान को अर्जित कर लेने के पश्चात भी मस्तिष्क से पशु ही रहता है।
 
हमारे वेद, पुराण और यहाँ तक की पंचतंत्र की कथाएं, विद्या का अगाध स्रोत हैं। उदहारण स्वरूप: कृष्ण-सुदामा की कथा, दधीचि का त्याग, दानवीर शिबि, हरिश्चन्द्र और कर्ण की गाथाएं, सावित्री-सत्यवान कथा, चार विद्वानों की शेर को जीवित करने की कथा इत्यादि सभी हमें सही गलत का भेद करने में सहायक हैं और जीवन उद्देश्य एवं जन कल्याण की राह भी दिखाती हैं।
 
आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो शिक्षा प्रणाली के अंक प्रतिशत मानक के कारण छिड़ा रण छात्रों में मूलतः चिंता और संताप भर रहा है। विद्या के आभाव में केवल शिक्षा के मद में झूमता युवा अपनें कर्तव्यों से विमुख हो केवल अतिउन्नति की दिशा में अग्रसर है। इसके परिणाम स्वरूप भारतवर्ष में बढ़ती आत्महत्या की दर, असहिष्णुता, वृद्धाश्रम, धर्मगुरुओं और राजनेताओं का बिन आंकलन समर्थन, धर्मों के बीच बढ़ता विवाद इत्यादि इसी उद्देश्य हीन व्यक्तित्व का प्रतिबिंब मात्र है। इतना ही नहीं प्रकृति और वायु में घुलता गरल, ग्लोबल वार्मिंग इत्यादि भी कर्तव्य विहीन इसी आधुनिक उन्नति के परिणाम हैं।
 
इस असामाजिक अराजक उन्नति का उत्तरदायित्व केवल शिक्षा प्रणाली के कंधों पर रखना भी उचित नहीं है। स्मरण रहे, शिशु के पहले शिक्षक और गुरु दोनों माता पिता होते हैं। हम सब और हमारा समाज देश को इस स्तिथि में लाने के लिए बराबर के उत्तरदायी हैं।
 
हमारे भारतवर्ष ने शिक्षा दर में उन्नति की है अब समय है शिक्षा प्रणाली में विद्या को शिक्षा के समान अधिकार देने का, अंततः विद्या और शिक्षा का समावेश ही सही मायनों में हमारे युवाओं को दिशा दिखायेगा, जिसके फलस्वरूप हमारा देश जन कल्याण और मानव प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा।
 
विद्या का अनुसरण कर ही प्रकृति का संतुलन बना रह सकता है, अन्यथा यह आधुनिक विकास आध्यात्मिक गुणों के अभाव में सृष्टि का पूर्णतः नाश करने में समर्थ है।


--विव
(विवेक शुक्ला)



Sunday, August 30, 2020

Kam Gaurav Ki Baat Nahin | कम गौरव की बात नहीं





Kam Gaurav Ki Baat Nahin | कम गौरव की बात नहीं


गिरि हिला, सिंधु संग नभ काँपा
भयभीत हुयी धरणी उस दिन
निर्भय, निश्चल, मुस्काता सा
वो पंथी चला, कुछ अविरल हो
यह कम गौरव की बात नहीं ।

भीषण विप्लव औ' अंधकार
भयलीन शशि, खद्योत का क्षय निश्चित
निर्भीक, निडर, गुर्राता सा
वो पंथी  चला, निज दिनकर बन
यह कम गौरव की बात नहीं ।

विधि क्रम से जो दीन हीन
धूल धूसरित वस्त्र उसके मलिन
कृषक, सृष्टा का सहभागी
वो पंथी चला, कुछ अर्पण कर
यह कम गौरव की बात नहीं ।।

--विव


@Viv Amazing Life

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