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Sunday, August 1, 2021

रावण-हनुमान संवाद | हिंदी कविता

 



।। रावण-हनुमान संवाद ।।


ब्रह्मदंड की मूर्छा

नागपाश का बंधन

हनुमत असुरों में घिरे

त्रास हरें रघुनंदन ।


वानर बंधन देखकर

हँसता है दसशीश

पुत्र निधन संताप पर

छुपा रहा है टीस ।


सभा मध्य हनुमत खड़े

देख रहे हुंकार

देव, शनि कर जोड़ते

करते हैं जयकार ।


गिरी दूर विद्युत कहीं

ऐसे रावण बरसा

बता दुष्ट तू कौन है

लगे वानरों जैसा ।


क्यों तूने वह बाग उजाड़ा

किस हट वश असुरों को मारा

राष्ट्र द्रोह का दंड भरेगा

तूने मम सुत है संहारा ।


नहीं मूर्ख तू जानता

रावण का प्रतिशोध

हम असुरों की क्रूरता

चंद्र, रवि को बोध ।


क्षण भर का फ़िर मौन रख

बोले हनुमत वीर

रघुनंदन का दूत मैं

धरो जरा तुम धीर ।


तेरा परिचय जानते

वीर सभी वानर हैं

वालि से संधि करे

तू कैसा कायर है ।


सहस्त्रबाहु का भुजबल

तुझे नहीं क्या याद

कैसी पीड़ा थी सही

बता पते की बात ।


मैंने वो तमिचर हने

लगा रहे जो घात

विटप, तरु को तोड़ना

वानर की है जात ।


वनवासी का दूत तू

आडंबर करता है

मृत्यु निकट है देख भी

जरा नहीं डरता है ।


राम नाम ही सत्य है

राम नाम की आस

राम नाम में बल बड़ा

राम नाम विश्वास ।


शंकर के वरदान पर

तू फूला जाता है

शंकर के जो ईश हैं

समझ नहीं पाता है ।


माया और अभिमान वश

सीता हर लाया है

रघुनंदन की संगिनी

मृत्यु संग लाया है ।


करुणा के वे स्रोत हैं

तजो बैर दसशीश

वैदेही वापस करो

औऱ नवाओ शीश ।


भरे क्षोभ, अभिमान वश

खीझ रहा दसग्रीव

सब मिल मारो दुष्ट को

काटो सठ यह जीव ।


काल क्रोध बन घूमता

खंडित होते काम

रावण की निश्चित गति

भला करें श्रीराम ।।


--विव

अंतर्मन | हिंदी कविता

 




।। अंतर्मन ।।


क्रुद्ध सूर्य की तप्त ज्वाल मैं

क्षुब्ध सिंधु की गहराई हूँ

विष्णु का मैं चक्र सुदर्शन

अंतर्मन की परछाई हूँ ।


दुःखी हृदय का दग्ध भाव मैं

पल-पल घिरती तन्हाई हूँ

निर्धन का मैं दारुण रुदन

अंतर्मन की रुसवाई हूँ ।


पूज्य शारदा की वीणा मैं

याद पिरोती पुरवाई हूँ

प्रेम पीयूष मैं करती क्रीड़ा

अंतर्मन की शहनाई हूँ ।


आदि जगत का परम समर मैं

शिशु भरे वो अँगड़ाई हूँ

कवि साधता मैं वो आख़र

अंतर्मन की चौपाई हूँ ।।


--विव

दिनकर और जीवन | हिंदी कविता

 



।। दिनकर और जीवन ।।


उदयाचल में सूर्य खिल उठा

हिलें पात डाली डाली

चहक उठे हैं सुप्त विहग गण

भोर हुई है मतवाली ।


मध्यांचल में सूर्य बढ़ा जब

विभा तप रही विकराली

अस्त-व्यस्त फ़िर रहा जीव भी

घाम डस रही ज्यों व्याली ।


दूर क्षितिज पर सुर्ख़ छटा वह

नई वधू की है लाली

महक रही सब कुसुम लताएँ

साँझ यहाँ मधु की प्याली ।


अस्ताचल में सूर्य अस्त अब

निशा दिख रही कुलपाली

जड़ हो रहा देख फ़िर जीवन

अंधयाली की व्यथा निराली ।।


--विव

प्रेम निशानी | हिंदी कविता

 




।। प्रेम निशानी ।।


नयन सेज से बहता पानी

दग्ध हृदय में यही रवानी

मधुर प्रेम और मोहित चातक

प्रेयस गा रहा कथा पुरानी ।


मेह ऋतु के पहले बादल

रिमझिम करता गिरता पानी

यूँ भीगा मैं यूँ भीगी तुम

शिव से जैसे मिले शिवानी ।


सर्द हवा और छाया कोहरा

कोयल कूके अमृत वाणी

देख पपीहा कुछ इठलाया

गहन प्रेम की यही निशानी ।


प्रेम कुसुम पर परिजन पीड़ा

जात पात है प्रथा निभानी

तिल तिल कर यूँ मरता यौवन

होती फ़िर है व्यर्थ जवानी ।।


--विव

प्रेम पीर कुछ दे जाता है | हिंदी कविता

 




।। प्रेम पीर कुछ दे जाता है ।।


मंद-मंद पल्लव का मरमर

भाव पुराने बिसराता है

प्रेम डगर और कुंठित मन फ़िर

ताप हृदय में दे जाता है ।


कूक-कूक कोयल मधुरित स्वर

स्वप्न सुनहरे सहलाता है

उच्छ्वास फ़िर वचन अधूरा

घाव गहन कुछ दे जाता है ।


भ्रमर-भ्रमर अलि गुंजित गायन

वफ़ा, सदाएं गोहराता है

उर तृष्णा फ़िर पसरा वेदन

अश्रु नयन में दे जाता है ।


झर-झर करता विस्मित निर्झर

व्यथा वही जो दोहराता है

आत्म द्वंद्व फ़िर प्रेयसी पीड़ा

प्रेम पीर कुछ दे जाता है ।।


--विव

नयन | हिंदी कविता

 



।। नयन ।।

नयनों की अपनी परिभाषा
नयनों का अपना गायन
नयनों में ही प्रेम व्याप्त है
नयनों में अद्भुत आकर्षण ।

नयनों में बिखरी हरियाली
नयनों में गहरा मरुथल
नयनों में एक सिंधु सजल है
नयनों में जीवन दर्शन ।

नयनों में खिलती कलिकाएँ
नयनों में कूके कोयल
नयनों में ही बजती वीणा
नयनों में पसरा यौवन ।

नयनों में दिखती मृगतृष्णा
नयनों में प्रज्वलित स्वप्न
नयनों में संचित मर्यादा
नयनों में अंतिम वंदन ।।


--विव

Wednesday, July 28, 2021

क्यों जाओ मुझको छोड़ ?





क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


घटा छा रही भूरी-कारी

पावस यूँ भरता किलकारी

नाच रहा मन, नाच रहे खग, नाच रहें है मोर

पिया! क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


हृदय धड़कता भारी-भारी

समझो मेरी भी लाचारी

गाती धरणी, गाती कोयल, चंचल तुम चितचोर

पिया! क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


करूँ प्रार्थना बारी-बारी

मुझको केवल प्रीत तुम्हारी

झूठा है जग, झूठी सखियां, देखूं तेरी ओर

पिया! क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


पड़े हिंडोले डारी-डारी

सावन की वृक्षों से यारी

देखो बिंदिया, देखो कंगना, दो! मेरी बाँह मरोड़

पिया! क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


लगे विहंगिनी हारी-हारी

नीड़ बचाना है कुछ भारी

गरजे अंबर, बरसे पानी, उसपर रात कठोर

पिया! क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


अँखियाँ रोयें कजरी-कारी

प्रियतम यह कैसी तैयारी

रिमझिम वर्षा, झमझम आँखें, किस्मत आदमखोर

पिया! क्यों जाओ मुझको छोड़ ?


--विव


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Sunday, August 23, 2020

प्रेम | Prem

 



प्रेम | Prem


प्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,
इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।

तुम राधा सी निश्छल काया मुझमे कृष्ण सा प्रेम भरा,
इस गीत रहित, निर्जीव अधर को मुरलीधर करने आयी हो।

तुम चिर वर्षा मैं चातक पर मेघों का आभाव यहाँ,
इक आशा, इस दुर्गम मरुथल पर बदरी बन कर छायी हो।

तुम द्रवित नीर मैं प्यासा पर कठुर घाम में ठोर कहाँ,
इस निठुर, खलित अकाल में टूटी गागर भरने आयी हो।

प्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,
इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।।


--विव

जीवन पथ तो इक संघर्ष | Jeevan Path to Ek Sangharsh




जीवन पथ तो इक संघर्ष | Jeevan Path to Ek Sangharsh


कौन रहा है चिर काल तक कौन रहेगा
केवल धूमिल स्मृतियां रह जाती
बैठे झर झर नीर बहाते, लाज ना आती
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

क्या लाये थे जो खोया है
व्यथित किस ताने बाने में
संशय छोड़ो, कर्मों का आह्वान करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

टूट गए हो इक गलती में
जीवन को बस इतना जाना
गिरना तो नियति है, उठो, सुधार करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

दारुण निशा, संकट है भारी
तम में तमचर राह जोहते
निर्भय हो प्रस्थान करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।।

--विव

लेखक का उद्गार | Lekhak Ka Udgar





लेखक का उद्गार | Lekhak Ka Udgar


कैसे लेखक, अद्भुत आलय
जब शब्द नहीं पूजे जाते
ना वीणा की धुन नही पल्लव के स्वर
विक्षत दारुण अट्टहास प्रबल।

चेतना शून्य विकृत लेखन
पाषाण हृदय पाठक सबल
कल्पित दुर्गम इस मरुथल पर
नागफनी पोषित निर्जल।

झर झर सरिता से अश्रु बहे
कालजयी खुद कालग्रस्त
अस्तित्व का है महा समर
नही क्षण भंगुर केवल।।

--विव

प्रेम अब निश्चित नही है | Prem Ab Nischit nahi hai

 



प्रेम अब निश्चित नही है | Prem Ab Nischit nahi hai


प्रिये निश्चिन्त हो कर जग बसाओ
किंचित ना बूझो ये कहानी
अंतिम विनय है भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

पाषाण हृदय रोता नही है
क्यों खड़ी संशय में हो
ना संकोच खाओ, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

पत्र जो तुमने लिखे थे
कर दिये अग्नि समर्पित
होम उनका हो गया, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

बंधन मुक्त कर दिया है
क्यों फंसी मझधार में हो?
यूँ ना ग्लानि बोध खाओ, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।।

--विव

पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा | Pathik Tumhe Ab Badhna Hoga



पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा | Pathik Tumhe Ab Badhna Hoga


डगर कठिन हो कठिन चुनौती 
ही चाहे गिर गिर जाये
साहस रख कर चलना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।

शूल चुभें हो इति भाल से हानि
घात चाहे शीश पे आये
हिम्मत रख कर लड़ना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।

घोर प्रलय हो दिनकर छिप जाये
जीवन मरण चक्र रुक जाये
संकट है कुछ करना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।

मृत्यु अटल हो प्रेम भी विलोप हो जाये
चेतना शून्य मनुज से पूछो
अवसान हेतु क्या करना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।।


--विव

नन्हा बच्चा | Nanha Bachcha





नन्हा बच्चा | Nanha Bachcha

आज भी मेरे अन्तर्मन में,
एक छोटा बच्चा रहता है,

वो खिलखिलाक़े हँसता है,
और सूरज से आंख लड़ाता है,

वो हवा से रेस लगाता है,
कभी लहरों सा बलखाता है,

वो आसमान में उड़ता है,
कभी भाई बहन से लड़ता है,

आइसक्रीम के लिए मन अब भी ललचाता है,
माँ की एक आवाज़ पे वो भागा-भागा जाता है,

आज भी मेरे अन्तर्मन में ,
एक नन्हा बच्चा रहता है।।

क्षमाप्रार्थी | Kshamaprarthi





 क्षमाप्रार्थी | Kshamaprarthi

बिना वजह अब तुमसे मैं संवेदना नही दिखाऊंगी,
सच तो यह है कि तुमको मैं लाचार देख न पाऊंगी
अब समय आ गया है जब तुमको सम्मान से जीना सिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

एक धूमिल सी स्मृति है जब मैं उंगली थामे चलती थी,
फिर हाथ छोड़कर भी तुमने, मुझ मे विश्वास दिखाया था,
समय आ गया है जब दूर खड़ी होकर, तुममें भरोसा वही जगाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

याद है अब भी जब तुमने रंग कई दिखलाये थे,
फिर एक दिन तुमने साथ बैठकर उनका मोल बताया था,
समय आ गया है जब मैं तुमको जीवन के रंग नए दिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

हल्का सा कुछ याद है मुझको जब तुमने मेरे आंसू पोछे थे,
फिर एक दिन तुमने मेरा कठिनाई से द्वंद कराया था,
समय है वो जब मैं तुमको मुश्किल में हंसना सिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

धुंधला सा स्मरण है जब मेरा खुद से विश्वास डगमगाया था,
तब तुमने मेरा हाथ पकड़कर थोड़ा सा हड़काया था,
अब वक्त आ गया है, तुमको वैसे ही हड़काऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

गलत समझना ना तुम मुझको , मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगी,
बूढ़े हो कमज़ोर नहीं, तुमको यह एहसास कराऊंगी,
जब तुम होगे एकाकी पथ पर, नेपथ्य से साथ निभाऊंगी
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।


कोख | Kokh





कोख | Kokh


देखो न माँ आज खुशियों ने कुंडी सी खटकाई है,
तुझसे मिलने दूर देश से नन्ही परी एक आई है,
मैंने सोचा मुझसे मिलकर तुम बहुत अधिक हर्षाओगी,
मुझको अपनी गोद मे पाकर फूली नही समाओगी।

मैंने सोचा तुमसे मिलकर मैं तुमको थोड़ा सा सताऊंगी,
और कभी फिर तुमसे छिपकर दूध मलाई खाऊँगी,
जब मुझको डाटोगी तुम तब रूठूँगी इतराउंगी,
फिर चुपके से तुमसे लिपटकर तुम संग मैं सो जाउंगी।

पापा के संग मैं भी एक दिन सब्जी मंडी जाउंगी,
और वहां से झोला भरकर सेब संतरे लाऊंगी,
झोला फटा देखकर मेरा उनको गुस्सा आएगा,
मीठी सी मुस्कान बिखेर तब उनको मैं मनाऊंगी।

पर माँ पापा अब मामला इससे  इतर कुछ लगता है,
बेटी हूँ मैं तेरी पर मुझको तुमसे डर कुछ लगता है,
आज लड़की होने की कीमत फ़िर शायद मैं चुकाउंगी,
क्या एक बार फिर कोख में ही मारी जाउंगी ??

आखिर क्यों | Akhir Kyon



 

आखिर क्यों | Akhir Kyon


आखिर क्यों मैं इतना निर्लज्ज हुआ,
जो उनका प्यार भुला बैठा,
जिनकी उंगलियां पकड़ कर चलना सीखा,
लाठी मैं उनको थमा बैठा।

वो कल की ही तो बातें थी,
जब तुम मुझे खिलाकर खाते थे,
ज़िम्मेदारियों का बहाना देकर ,
तुम्हारा अथाह स्नेह भुला बैठा।

वो कल की ही तो बातें थी,
जब तुम हर सांझ मेरी राह जोहते थे,
परवाह को बंदिश समझ कर मैं,
तुमको अपशब्द सुना बैठा।

वो कल की ही तो बातें थी,
जब तुम मेरी खातिर मिट्टी के घरौंदे बनाते थे,
तुम्हारा घर तोड़कर मैं,
तुमको वनवास पठा बैठा।

Saturday, July 27, 2019

शायर लिख सकता है चिंगारी | Shayar Likh Sakta Hai Chingari



शायर लिख सकता है चिंगारी | Shayar Likh Sakta Hai Chingari


गरीब बच्चे सिग्नल पर, वो रेलवे स्टेशन और क्या बस-अड्डे,
हमेशा मांगते फिरते, दुधमुहे, तुतलाते, अड़ियल, कुछ जिद्दी से,
तुम फेंकते चिल्लर, वो एक रुपया वो दो रुपिया, वो हर्ष और दान का सुख,
कभी रुक-कर सोंचा है उनका भी, किसके तनय हैं वो?
कहीं दूर उनकी माँ, वो माँ जिसका दूध भी शायद पुत्र-विरह में अब सूख चुका है,
फिर क्यों वो शायर, जो लिख सकता है चिंगारी, मग़र वो प्यार लिखता है?

वाह, इतनी शर्म, इतनी हया, और कितने संस्कारों से गुथे-बंधे हो तुम,
पर सोंचो, अगर इतनी अना से तुम बंधे होते, तो फ़िर क्या कोई निर्भया होती?
उस पर तुम्हारा छद्मवेश, जो तुम स्वार्थ हेतु दिन रात रचते हो,
यहाँ होता है, रोज़ जिंदगी से खिलवाड़, बलात्कार और उस पर कोठों पर बिकती अस्मतें,
फिर क्यों वो शायर, जो लिख सकता है चिंगारी, मग़र वो प्यार लिखता है?

वो बाढ़, वो सूखा और सड़ती फसलें, उम्मीदों का होम आंखों के सामने,
ख़्वाबों का टूटना, पाई-पाई को तरसना, फिर फांसी, हाय वो गरीब किसान,
छोड़ो, ये व्यर्थ बातें है, तुम्हे इनसे क्या? तुम्हे तो क्लब जाना है, अपना घर बनाना है, नई गाड़ी चलानी है,
तुम्हारा ये स्वार्थ, ये खुदगर्ज़ी, शायर को रुलाती है,
फिर क्यों वो शायर, जो लिख सकता है चिंगारी, मग़र वो प्यार लिखता है?

वो स्याह काला रंग, दहेज़ और बेटी का घर से विदा ना होना,
वो बाप की मजबूरी, माँ का दुःख और टूट कर बिखरती अनब्याही वधु,
मुख्तलिफ वो जाति का खेल, पाखंड और प्रेम के अपराध में अपने ही परिजनों की जान लेते तुम,
ये अद्धभुत रीतियों से भरा तुम्हारा आधुनिक समाज, इस-पर अंतहीन आडम्बर और खोखली बातें?
फिर क्यों वो शायर, जो लिख सकता है चिंगारी, मग़र वो प्यार लिखता है?

ये तुम्हारा धर्म, ये तुम्हारे लोग और उन-सब का प्यार भी तुम्हारे ही लिए,
पर जब रहते हैं सब यहाँ मिल-जुल कर, तो कौन जलाता है ये मंदिर, ये मस्ज़िद और ये गिरजाघर? ये जो सवाल है ना, ये सवाल तुम्हारे ही लिए है,
वो दंगों में जलते मासूम बच्चे, वो चीखती माएँ, फिर वो पुकार, हाँ उन्हीं विधवाओं की पुकार, जिनके अश्रु भी अब सूख चुके हैं,
विडंबना ये, की तुम्हे देने हैं जवाब, तुम जो इसका कारण हो, हाकिम हो और बने बैठे हो पैगम्बर?
फिर क्यों वो शायर, जो लिख सकता है चिंगारी, मग़र वो प्यार लिखता है?

ये दुःख ये पीड़ा, सब जानता है वो, फ़िर क्यों लिख नही सकता?
जब इतना भला है तो, क्यों गरीबों की आहों के लिए बिक नही सकता?
वो शांत है मौला उसे तुम शांत रहने दो, वो अंतर्विरोध, जलता दिल और उसका मानसिक द्वंद,
फ़िर उसकी रूह का कहना, की जलती आग में फेके वो अगर शब्दों की नई ज्वाला, तो आग भड़केगी, इसमें हुनर है क्या?
वो कहता है, वो रूठों को मिलाएगा, बुझे दीपक जलाएगा, अपने शब्दों से जलती राख में जल देगा, नए पौधे खिलायेगा,
वो शायर, जो लिख सकता है चिंगारी, मग़र वो प्यार लिखता है।।

--विव

Saturday, July 20, 2019

तुम काम करते हो | Tum Kam Karte Ho



तुम काम करते हो | Tum Kam Karte Ho

 
ये जो गरीब की कटोरी में सिक्के उछाल कर खुशी बटोर लेते हो, ...
कभी समझा है दुख उसका? यही नियति है क्या उसकी?
'चिंतन हाय ये चिंतन', छोड़ो समय कहां, के तुम काम करते हो।
 
माँ बाप से उलझ कर बात ना करना, "मदर -फादर डे" पर प्यार 'फेसबुक' पे धरना,
यही सच है क्या? आडंबरों में भरे दिवालिया हो तुम?
पर तुम्हे चिन्ता कहां, तुम व्यस्त रहते हो, के तुम काम करते हो।
 
अपनी अहलिया* से शायद नाराज रहते हो,
खुद नही समझते कुछ भी और उसको समझाते हुए हर बात कहते हो,
कभी समझा है उसको भी, उसका दुख उसकी पीड़ा और वो अकेलापन?
छोड़ो तुम समय व्यर्थ ना करो, के तुम काम करते हो।
 
अपने ही बच्चों से अक्सर अदावत* में रहते हो,
वो अल्लढ़ता वो किलकारियां वो प्यार कहां गुम है सब?
केवल एकेडमिक्स बिन संस्कार तो कोई दिशा नही,
इस विघटन की भी तुम फिक्र ना करो, के तुम काम करते हो।
 
ये मोबाइल में प्रेम और व्हाट्सएप्प पर गुस्सा दिखाना,
ये ' स्लैंग, इमोजी और स्माइली ' का जमाना,
समय होने पे मिलकर दो बात ना करना, पर प्रदर्शन दुनिया को दिखाना,
हाय रे प्रेम, अगर इस प्रेम को मजनू ने समझा होता,
तो वो संभव ही तथागत हो गया होता,
छोड़ो इस पागलपन को, तुम खुश रहो, के तुम काम करते हो।
 
ये सोशल मीडिया पर 'व्यक्ति विशेष की भक्ति ', देश प्रेम और अदभूद साहस,
हिन्दू, मुस्लिम और जाति पर देश खूब बनाते और इसका विकास करते हो,
छोड़ो ये तो नवनिर्माण है, कैसा चिंतन केवल वंदन,
तुम निश्चिन्त रहो, सच है के तुम काम करते हो।
 
ये छद्मवेश*, ये अंतर्द्वंद और ये मानसिक पीड़ा,
दिवालियेपन में भी निश्चिन्त रहो, तुम्हे समय कहां,
तुम नही आराम करते हो, तुम सर्वदा काम करते हो।।
 
 
अहलिया*: धर्म पत्नी
अदावत*: लड़ाई झगड़ा
छद्मवेश*: बनावटी परिधान
 
 
--विव
 
 

खंडहर | Khandhar



खंडहर | Khandhar


उनसे पलभर में रूठना और फिर मान जाना,
जी भर मार-पिटाई और फिर तिरछी आंखें दिखाना,
भाई-बहन उफ़ मेरा बचपन और वो घर,
हाँ वही घर जो अब खंडहर सा हो गया है।

माँ के हाथ की रोटी, वो लोरियाँ रात में जो हमको सुलाती थीं,
पापा का गुस्सा, तकरार और वो प्यार सब याद है मुझे,
माँ-बाप का कंधा और छोटा सा मैं,
मैं जो दशहरे की भीड़ में शायद सबसे ऊंचा हो जाता था,
चलो लौट चलें उस घर,
वही घर जो अब खंडहर सा हो गया है।

वो मेरा पहला प्यार, एटलस साईकल और उसका मोहल्ला,
एक अल्लढ़, एक दीवाना, मैं एक बेवकूफ सा लड़का,
उसकी एक झलक के लिए मैं जो पलभर में धरा नाप देता था,
सब याद है मुझे, आँखें झुका कर उसका चल देना,
वो सादगी, वो शर्म जो कभी उसकी आँखों से मेरी आँखों मे भी उतर आया करती थी,
उसका घर मेरे घर के पास ही तो था,
मेरा घर, वही घर जो अब खंडहर सा हो गया है।

मेरे दोस्त, मेरे यार वो सब थे मेरे हमसाये,
हम सब वहीं पले बढ़े, अगणित शरारतें, हम कितनी मार खाए,
वो फूहड़ ,वो गंवार , वो संगी-साथी जो जान थे मेरी,
आज वो दिन है कि वो पहचान में भी नही,
लौटा दो उन्हें, मेरे घर के पास ही तो रहते थे वो,
पर वो घर, हाँ वही घर जो अब खंडहर सा हो गया है।

अब ना बचपन है और ना भाई-बहन के साथ वो तकरार ही रही,
फूहड़ दोस्तों से रुक्सती तो उससे भी पुरानी है,
वो मासूम सी लड़की जो माशूक थी मेरी,
उससे कोई ताल्लूक तो नही पर अब वो उसी बचपन मे उलझे एक बच्चे की माँ है,
मेरे माँ-बाप, वो तो वही हैं, मैं ही उनसे दूर हूँ शायद,
और फिर मेरा वो घर, हाय वही घर जो अब खंडहर सा हो गया है।।


@हमारे पुराने अलीगंज के घर को समर्पित
घर संख्या: 296, अलीगंज, लोधी-रोड, नई दिल्ली-110003


-विव



बरगद | Bargad


बरगद | Bargad


वो गर्मी का महीना और वो बचपन के अठखेली,
उसके दामन की वो छांव जहां धूप का नाम भी नही,
उसकी डेहरी पर फिसलना, गिरना और फिर चढ़ना,
वो बड़ा, एक पुराना पेड़ ही तो था?
बरगद का वो पेड़ ना जाने क्यों मुझे मेरे अग्रज सा लगता था।


वो जून के महीने में साथी-संगी सहित तारकोल भरी छत पर चढ़ जाना,
वो मीठी-खट्टी गूलर जो मुझे आम के अचार सी लगती थीं,
गुलरों के कीड़े जिन्हें देख हम घिनाते थे और भाग जाते थे,
वो गूलर उसी बरगद की तो थीं,
बरगद का वो पेड़ ना जाने क्यों मुझे मेरे अग्रज सा लगता था।

मानसून की वो भीषण बारिश, घर मे जब बाढ़ सी आ जाती थी,
पूरा मोहल्ला मुझे समुंदर और वो पेड़ टापू सा लगता था,
दुनिया तर, और अचरज उसकी घनी छांव में पानी की एक बूंद भी नही,
हाँ, बरगद का वो पेड़ ना जाने क्यों मुझे मेरे अग्रज सा लगता था।

वो वटसावित्री, वो आम और वो पीला धागा,
माँ ना जाने क्यों वो पीला धागा उसकी कलाई में राखी की तरह बांध देती थीं,
उसकी फैली जटाओं में लटकना और गगन छूकर लौट आना, सब याद है मुझे,
बरगद का वो पेड़ ना जाने क्यों मुझे मेरे अग्रज सा लगता था।

वो बड़े भाई की भूत की कहानी और हम सबका डर से चादर में छिप जाना,
चाचा का 'कुम्भकर्ण था अति महाबली' सुनाना और शाम को पॉपिंस लाना,
'वो चंद्रकांता , वो क्रूरसिंह ' का नाट्य रूपांतरण,
बाबा की तस्वीर, दादी का प्यार और माँ-बाप का दुलार,
सब उस पुराने पेड़ के साये में ही तो था,
बरगद का वो पेड़ ना जाने क्यों मुझे मेरे अग्रज सा लगता था।

अब वीरान है सब, ना वो मोहल्ला है, ना वो घर ही रहे,
केवल खरपतवार, जंगल और बियाबान है अब सब,
उस खामोशी में भी एक साधु एक त्यागी लीन रहता है,
वो शायद कुछ ना कहकर भी हज़ारों कहानियां कहता है,
हाँ मुझे अब मालूम है, वो बरगद क्यों मुझे मेरे अग्रज सा लगता था।।


@हमारी तरफ से उस विशाल पुराने बरगद के वृक्ष को समर्पित, जिसके साये में हमारा बचपन खिला खेला है।

"ओउ्म् वट वृक्षाय नमः"


-विव




@Viv Amazing Life

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