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Sunday, August 30, 2020

Kam Gaurav Ki Baat Nahin | कम गौरव की बात नहीं





Kam Gaurav Ki Baat Nahin | कम गौरव की बात नहीं


गिरि हिला, सिंधु संग नभ काँपा
भयभीत हुयी धरणी उस दिन
निर्भय, निश्चल, मुस्काता सा
वो पंथी चला, कुछ अविरल हो
यह कम गौरव की बात नहीं ।

भीषण विप्लव औ' अंधकार
भयलीन शशि, खद्योत का क्षय निश्चित
निर्भीक, निडर, गुर्राता सा
वो पंथी  चला, निज दिनकर बन
यह कम गौरव की बात नहीं ।

विधि क्रम से जो दीन हीन
धूल धूसरित वस्त्र उसके मलिन
कृषक, सृष्टा का सहभागी
वो पंथी चला, कुछ अर्पण कर
यह कम गौरव की बात नहीं ।।

--विव


Sunday, August 23, 2020

प्रेम | Prem

 



प्रेम | Prem


प्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,
इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।

तुम राधा सी निश्छल काया मुझमे कृष्ण सा प्रेम भरा,
इस गीत रहित, निर्जीव अधर को मुरलीधर करने आयी हो।

तुम चिर वर्षा मैं चातक पर मेघों का आभाव यहाँ,
इक आशा, इस दुर्गम मरुथल पर बदरी बन कर छायी हो।

तुम द्रवित नीर मैं प्यासा पर कठुर घाम में ठोर कहाँ,
इस निठुर, खलित अकाल में टूटी गागर भरने आयी हो।

प्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,
इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।।


--विव

जीवन पथ तो इक संघर्ष | Jeevan Path to Ek Sangharsh




जीवन पथ तो इक संघर्ष | Jeevan Path to Ek Sangharsh


कौन रहा है चिर काल तक कौन रहेगा
केवल धूमिल स्मृतियां रह जाती
बैठे झर झर नीर बहाते, लाज ना आती
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

क्या लाये थे जो खोया है
व्यथित किस ताने बाने में
संशय छोड़ो, कर्मों का आह्वान करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

टूट गए हो इक गलती में
जीवन को बस इतना जाना
गिरना तो नियति है, उठो, सुधार करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

दारुण निशा, संकट है भारी
तम में तमचर राह जोहते
निर्भय हो प्रस्थान करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।।

--विव

लेखक का उद्गार | Lekhak Ka Udgar





लेखक का उद्गार | Lekhak Ka Udgar


कैसे लेखक, अद्भुत आलय
जब शब्द नहीं पूजे जाते
ना वीणा की धुन नही पल्लव के स्वर
विक्षत दारुण अट्टहास प्रबल।

चेतना शून्य विकृत लेखन
पाषाण हृदय पाठक सबल
कल्पित दुर्गम इस मरुथल पर
नागफनी पोषित निर्जल।

झर झर सरिता से अश्रु बहे
कालजयी खुद कालग्रस्त
अस्तित्व का है महा समर
नही क्षण भंगुर केवल।।

--विव

प्रेम अब निश्चित नही है | Prem Ab Nischit nahi hai

 



प्रेम अब निश्चित नही है | Prem Ab Nischit nahi hai


प्रिये निश्चिन्त हो कर जग बसाओ
किंचित ना बूझो ये कहानी
अंतिम विनय है भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

पाषाण हृदय रोता नही है
क्यों खड़ी संशय में हो
ना संकोच खाओ, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

पत्र जो तुमने लिखे थे
कर दिये अग्नि समर्पित
होम उनका हो गया, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

बंधन मुक्त कर दिया है
क्यों फंसी मझधार में हो?
यूँ ना ग्लानि बोध खाओ, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।।

--विव

पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा | Pathik Tumhe Ab Badhna Hoga



पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा | Pathik Tumhe Ab Badhna Hoga


डगर कठिन हो कठिन चुनौती 
ही चाहे गिर गिर जाये
साहस रख कर चलना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।

शूल चुभें हो इति भाल से हानि
घात चाहे शीश पे आये
हिम्मत रख कर लड़ना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।

घोर प्रलय हो दिनकर छिप जाये
जीवन मरण चक्र रुक जाये
संकट है कुछ करना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।

मृत्यु अटल हो प्रेम भी विलोप हो जाये
चेतना शून्य मनुज से पूछो
अवसान हेतु क्या करना होगा
पथिक तुम्हे अब बढ़ना होगा।।


--विव

नन्हा बच्चा | Nanha Bachcha





नन्हा बच्चा | Nanha Bachcha

आज भी मेरे अन्तर्मन में,
एक छोटा बच्चा रहता है,

वो खिलखिलाक़े हँसता है,
और सूरज से आंख लड़ाता है,

वो हवा से रेस लगाता है,
कभी लहरों सा बलखाता है,

वो आसमान में उड़ता है,
कभी भाई बहन से लड़ता है,

आइसक्रीम के लिए मन अब भी ललचाता है,
माँ की एक आवाज़ पे वो भागा-भागा जाता है,

आज भी मेरे अन्तर्मन में ,
एक नन्हा बच्चा रहता है।।

क्षमाप्रार्थी | Kshamaprarthi





 क्षमाप्रार्थी | Kshamaprarthi

बिना वजह अब तुमसे मैं संवेदना नही दिखाऊंगी,
सच तो यह है कि तुमको मैं लाचार देख न पाऊंगी
अब समय आ गया है जब तुमको सम्मान से जीना सिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

एक धूमिल सी स्मृति है जब मैं उंगली थामे चलती थी,
फिर हाथ छोड़कर भी तुमने, मुझ मे विश्वास दिखाया था,
समय आ गया है जब दूर खड़ी होकर, तुममें भरोसा वही जगाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

याद है अब भी जब तुमने रंग कई दिखलाये थे,
फिर एक दिन तुमने साथ बैठकर उनका मोल बताया था,
समय आ गया है जब मैं तुमको जीवन के रंग नए दिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

हल्का सा कुछ याद है मुझको जब तुमने मेरे आंसू पोछे थे,
फिर एक दिन तुमने मेरा कठिनाई से द्वंद कराया था,
समय है वो जब मैं तुमको मुश्किल में हंसना सिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

धुंधला सा स्मरण है जब मेरा खुद से विश्वास डगमगाया था,
तब तुमने मेरा हाथ पकड़कर थोड़ा सा हड़काया था,
अब वक्त आ गया है, तुमको वैसे ही हड़काऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

गलत समझना ना तुम मुझको , मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगी,
बूढ़े हो कमज़ोर नहीं, तुमको यह एहसास कराऊंगी,
जब तुम होगे एकाकी पथ पर, नेपथ्य से साथ निभाऊंगी
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।


@Viv Amazing Life

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