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Saturday, September 19, 2020

शिक्षा नीति 2020 : मेरी नजऱ | Education Policy 2020 : My Views

 



शिक्षा नीति 2020 : मेरी नजऱ


शिक्षा नीति वो शैक्षिक दिशा निर्देश हैं, जो भारत सरकार द्वारा घोषित किये जाते हैं। इस नीति के द्वारा सरकार देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा निर्धारित करती है। शिक्षा नीति में उन सभी विषयों का उल्लेख होता है, जो सरकार के अनुसार देश की शिक्षा व्यवस्था के सुधार और उन्नति के लिए आवश्यक हैं।


महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षा नीति में दिए गए दिशा निर्देश संवैधानिक दृष्टि से सिद्धांत के रूप में तो देखे जा सकते हैं, परंतु इसके अतिरिक्त यह स्वयं में कोई अधिकार नही रखते और इस कारण सरकार इन्हें प्रवत्त करने के लिए संवैधानिक एवं न्यायिक दृष्टि से बाध्य नहीं है।


2020 में घोषित शिक्षा नीति स्वतन्त्र भारत के इतिहास में आयी तीसरी बड़ी शिक्षा नीति है।


भारत की प्रथम शिक्षा नीति सन 1968 में कोठारी आयोग की रिपोर्ट के आधार पर श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा घोषित की गई थी। उस शिक्षा नीति का रुझान सभी को एक समान शिक्षा अवसर देने और 14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने पर था। उस समय यह दोनों ही दिशा निर्देश भारतीय एकता और अखंडता के लिए आवश्यक थे।


भारत की दूसरी शिक्षा नीति सन 1986 में श्री राजीव गांधी द्वारा लायी गई थी। उस शिक्षा नीति का केंद्र शिक्षा के अधिकार को गरीब, पिछड़ों, दलितों इत्यादि तक पंहुचाना था। उस नीति में पहली बार छात्रों के लिए छात्रवृत्ति, और जो नागरिक आर्थिक समस्याओं के चलते बच्चों को विद्यालय भेजने में असमर्थ हैं उनके लिए प्रोत्साहन राशि कि बात की गई थी। इसके अतिरिक्त शिक्षा नीति में पहली बार स्वतंत्र शिक्षा संस्थानों की भी बात भी की गई थी। शिक्षा व्यवस्था को सुदृण करने के लिए देश की जीडीपी का 6% प्रतिवर्ष शिक्षा बजट के लिए आरक्षित करने का उल्लेख भी शिक्षा नीति में था।


सन 1992 में श्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में दूसरी शिक्षा नीति में कुछ संशोधन किये गए।


अब 28 वर्ष के एक बड़े अंतराल के बाद भारत की तीसरी शिक्षा नीति श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लाई गई है। 2020 में आई शिक्षा नीति के प्रमुख दिशा निर्देश इस प्रकार हैं :


1) शिक्षा के अनिवार्य अधिकार(RTE) को 6 से 14 वर्ष की आयु से बढ़ाकर 3 से 18 वर्ष करने का उल्लेख

2) प्रारंभिक बाल शिक्षा व्यवस्था और देखभाल पर ज़ोर

3) छात्र शिक्षा के प्रथम पाँच वर्ष तक मातृभाषा के आधार पर शिक्षा देने पर टिप्पणी

4) विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के विघटन की आवश्यकता पर बल

5) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एमफिल को रद्द करने की बात

6) उच्च शिक्षा में बहु विकास विकल्प की आवश्यकता पर ज़ोर

7) शिक्षा प्रणाली के मूलभूत ढांचे को 10+2 से 5+3+3+4 में बदलने का उल्लेख

8) शिक्षा में क्रिटिकल थिंकिंग के प्रयोग-प्रसार पर टिप्पणी

9) शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता रखनें और शिक्षा मित्रों अथवा अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति पर रोक लगाने की बात

10) विभिन्न विद्यालयों में सीमित संसाधनों के साझा प्रयोग की आवश्यकता पर ज़ोर

11) शिक्षा नीति में सरकार ने छात्रों के विद्यालय छोड़ने के प्रतिशत को लेकर चिंता जताई एवं उचित क़दम उठाकर आगामी 10 वर्षों में 100% बच्चों को माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करवाने के लक्ष्य की बात रखी

12) एक नए राष्ट्रीय शिक्षा आयोग के गठन की आवश्यकता का भी उल्लेख किया गया

13) जीडीपी के 6% को शिक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आरक्षित करने की बात भी की गई



शिक्षा नीति में आये कुछ नए दिशा निर्देश और मेरे विचार :


1) प्रारंभिक बाल शिक्षा व्यवस्था और देखभाल : मानव मस्तिष्क का अधिकांश विकास 7-8 वर्ष की आयु तक हो जाता है, इसकी आवश्यकता समझते हुए सरकार ने शिक्षा नीति में निःशुल्क प्रारंभिक शिक्षा पर बल दिया है। मेरे विचार में यह एक उत्तम कदम है।


2) शिक्षा प्रणाली के मूलभूत ढांचे को 10+2 से 5+3+3+4 बदलने का उल्लेख : यह एक महत्वपूर्ण बात है क्योंकि मनुष्य जीवन में कई चरण हैं और शिक्षा भी उसी आधार पर होनी चाहिए, वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में प्रयुक्त 10+2 मेरे विचार में उपयुक्त नहीं है।


3) शिक्षकों की नियुक्ति में पारदर्शिता : यह एक उचित बात है, इस प्रकार दोषपूर्ण सरकारी तंत्र की वजह से हो रहे शिक्षकों के शोषण पर रोक लगेगी और अच्छे शिक्षकों को उचित अवसर भी प्राप्त होंगे, इसके चलते समय के साथ शिक्षा स्तर में भी सुधार होगा।


4) उच्च शिक्षा में बहुविकास विकल्प की आवश्यकता पर ज़ोर : यह एक अच्छा कदम है क्योंकि आर्थिक समस्याओं के चलते बहुत से विद्यार्थी उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश तो लेते हैं पर उन्हें पूरा नहीं कर पाते, इस स्थिति में समय और शिक्षा को महत्व देते हुए 1 वर्ष में सर्टिफिकेट, 2 वर्ष में डिप्लोमा और तीन वर्ष में डिग्री देने की बात की गई है।


5) विश्‍वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के विघटन की आवश्यकता पर बल : मेरे विचार में किसी भी संस्थान को शिक्षा क्षेत्र में सभी अधिकार देना ठीक नही है, इस कारण ऐसी संस्थाओं का विघटन शिक्षा स्तर में सुधार के लिए आवश्यक है।



दिशा निर्देशों को लेकर उठ रहे विवाद और असमंजस की स्थिति :


1) प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा के आधार पर हो : इस दिशा निर्देश को लेकर जनता में असमंजस की स्थिति बनी हुई है, कुछ लोग इसे नई दिशा में उत्तम कदम बता रहे हैं तो कुछ इसे वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को अशक्त करने की कोशिश कह रहे हैं।


मेरे विचार में शिक्षार्थी आधार के लिए प्रारंभिक शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, सत्य यह भी है की इस दिशा निर्देश में कुछ नया नहीं है और इसका उल्लेख हमें पिछली दोनों शिक्षा नीतियों में भी मिलता है।


2) शिक्षा में क्रिटिकल थिंकिंग का प्रयोग प्रसार : इस दिशा निर्देश में भी लोगों का मत बटा दिखायी देता है, मेरे विचार में इस विषय पर केवल टिप्पणी मात्र कर देने से, शिक्षा क्षेत्र में क्रिटिकल थिंकिंग के प्रयोग-प्रसार में सहायता नहीं होगी, यह अति आवश्यक विषय है और सरकार को मार्गदर्शन हेतु गहन दिशा निर्देश देने चाहिए थे परंतु नई शिक्षा नीति में इसका अभाव प्रतीत होता है।


3) जीडीपी के 6% को शिक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये आरक्षित करने का उल्लेख : इस दिशा निर्देश को लेकर जनमानस अति उत्साहित प्रतीत हो रहा है क्योंकि वर्तमान में जीडीपी का लगभग 4% ही शिक्षा के लिये प्रयोग होता है।


मेरे विचार में यह अच्छा कदम है परंतु नया नहीं, स्वतंत्र भारत में आई सभी शिक्षा नीतियों के दिशा निर्देशों में जीडीपी का 6% शिक्षा के क्षेत्र में प्रयोग हो इसका उल्लेख मिलता है।


4) विभिन्न विद्यालयों में सीमित संसाधनों के साझा प्रयोग की आवश्यकता पर ज़ोर : इस दिशा निर्देश को लेकर भी बुद्धिजीवी बटे हुए प्रतीत होते हैं, एक पक्ष के अनुसार कुछ संसाधन नहीं होने से साझा संसाधन होने बेहतर हैं। परंतु इसके साथ यह संदेह भी जताया जा रहा है की इस नीति की आड़ में सरकार अपने उत्तरदायित्व से पीछे हट रही है और यदि इस प्रकार संसाधनों को प्रयोग में लाया गया तो संभवतः वो किसी के लिए भी लाभप्रद नहीं रह पायेंगे।


5) उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एमफिल को रद्द करने की बात : इस दिशा निर्देश को लेकर शिक्षित वर्ग बटा हुआ है, एक वर्ग रिसर्च के आधार के रूप में इसे देखता है और दूसरा इसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर रहा है।


मेरे विचार में जो छात्र एमफिल करते हैं, उनका गंतव्य भी पीएचडी ही होता है। इस आधार पर देखें तो एमफिल की अलग से कोई विशेष आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है।



मंशा को लेकर संशय :


1) शिक्षा नीति में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग(EWS) को लेकर निर्देशों के विषय में पूर्णतः चुप्पी साधी गई है। यह शांति इस कानून को अशक्त करने की दिशा में संकेत देती प्रतीत होती है।


2) नई नीति में शिक्षा के क्षेत्र में असमानताओं को कम करने की दिशा में कोई ठोस निर्देश नहीं मिलते, अर्थात पिछड़ा वर्ग के शिक्षा स्तर सुधार की दिशा में कोई उपरोक्त कदम लेती यह नीति प्रतीत नहीं होती है।


3) यूपीए सरकार के कार्यकाल में शिक्षा के अनिवार्य अधिकार(RTE) के अंतर्गत, शिक्षा स्तर उत्थान के लिए 2009 में कुछ कारगर नीतियाँ लायी गईं थी, नई नीति आवरण में तो पुरानी नीति का विस्तार लगती है परंतु यदि गहनता से देखें तो कुछ निर्देश अधिकार को निःशक्त करने की दिशा में संदेह भी उत्पन्न करते हैं।



मेरा अवलोकन और विचार :


मेरी दृष्टि में नई शिक्षा नीति को लेकर न हमें अति उत्साहित होने की आवश्यकता है और न ही निरुत्साहित होने की, आवश्यकता है तो केवल इसे समझने की और सम्पूर्णता में इसका अवलोकन करने की।


मैंने प्रारंभ में कहा शिक्षा नीति शिक्षा की दिशा में केवल दिशा निर्देश हैं और यह अपने आप में कोई संवैधानिक या न्यायिक अधिकार नहीं रखते। तो प्रत्येक सरकार नीतियाँ तो बहुत उत्तम बनाती है पर किसी कानूनी या संवैधानिक बाध्यता के न होते, इन्हें प्रयुक्त केवल कुछ अंशों में करती है और वह भी केवल अपनी आवश्यकता और राजनैतिक रुझान के अनुसार।


भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें तो शिक्षा नीति के केवल 15%-20% दिशा निर्देश ही किसी कानून या संविधानिक अधिकार में परिवर्तित हो पाते हैं और वो अधिकार ही  वास्तविक रूप में शिक्षा व्यवस्था का स्तर औऱ दिशा निर्धारित करने में उपयोगी होते हैं।


मेरे विचार में नई शिक्षा नीति उत्तम है परंतु इससे पहले आई शिक्षा नीतियाँ भी अपने समय और आवश्यकताओं के अनुसार श्रेष्ट थीं। अतः देखना यह है की सरकार की कथनी और करनी में कितना समन्वय या भिन्नता हमें देखने को मिलती हैं क्योंकि अंत मे वही मंशा हमारी शिक्षा व्यवस्था की दशा और दिशा तय करेगी।


--विव 
(विवेक शुक्ला)

Sunday, September 13, 2020

धर्म क्या है ? | Dharm kya hai ?





 धर्म क्या है?


धर्म एक संस्कृत शब्द है, इसका शाब्दिक अर्थ है "धारण करने योग्य", अर्थात् सभी गुण जो मानवता के मूल सिद्धान्तों के अनुकूल धारण करने योग्य हों, वो धर्म हैं।

परंतु, धर्म का अर्थ जितना सरल है इसकी विवेचना उतनी ही जटिल।

अब प्रश्न यह उठता है कि मानवता के सिद्धांतों के अनुकूल धारण करने योग्य गुण क्या हैं? इस प्रश्न का उत्तर हमें वेदों में मिलता है, जिनके अनुसार सत्य, अहिंसा, शांति, न्याय इत्यादि मानवता के प्रमुख गुण है।

धर्म की संकल्पना इतनी व्यापक है कि इसका कोई भी पर्यायवाची हमें किसी दूसरी भाषा में देखने को नहीं मिलता। इंग्लिश शब्द रेलीजन अर्थात आस्था एवं विश्वास, हिंदी शब्द सम्प्रदाय और उर्दू शब्द मज़हब अर्थात् एक प्रकार की परंपरा और विचारधारा को मानने वाला समुदाय। शाब्दिक विवशताओं के चलते प्रयोग में तो हैं, परंतु यह सभी धर्म को परिभाषित करने में असमर्थ हैं।

साधारण धारणा के विपरीत हिंदू, सिख, मुस्लिम, ईसाई सभी धर्म न होकर केवल सम्प्रदाय हैं, क्योंकि इनका स्रोत वेदों से पृथक एक पारंपरिक विचारधारा है। एक अपवाद सनातन धर्म है जिसका उद्गम वेद और उपनिषद एवं लक्ष्य जन कल्याण है, अतः इसे धर्म कहना असत्य नहीं है।


वेदों एवं पुराणों में धर्म का मानवीय चित्रण भी मिलता है जो धर्म को परिभाषित करने में सहायक है, जिसके अनुसार धर्म और अधर्म दोनों ही ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं।

अधर्म की पत्नी हिंसा हैं और नर्क एवं भय अधर्म के प्रपौत्र हैं।

धर्म की पत्नी अहिंसा हैं और विष्णु धर्म के पुत्र हैं। इसी कारण, श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण कहते हैं:

"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

अर्थात् जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म आगे बढ़ता है, तब मैं धर्म की रक्षा हेतु अवतार लेता हूँ।

सनातन धर्म में पुरुषार्थ के चार स्तंभ बताए गए हैं, धर्म, काम, अर्थ एवं मोक्ष, जिनमें धर्म श्रेष्ठ है। सनातन में धर्म के दस लक्षणों का भी उल्लेख मिलता है जिनमें सत्य, क्षमा, दम, विद्या, अक्रोध आदि प्रमुख हैं।

धर्म विस्तृत है परंतु इसका मार्ग सदा शांति, अहिंसा और उन्नति का मार्ग एवं लक्ष्य जन कल्याण रहा है।

जो सम्प्रदाय को धर्म कहता है वह ज्ञानी है और जो धर्म को विध्वंश का कारक मानता है वो महामूर्ख है।


आज के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो ज्ञान के अभाव में धर्म-धर्म न रहकर कुछ अति महत्वकांक्षी विचारधाराओं की लक्ष्य पूर्ति का साधन मात्र रह गया है।

विभिन्न संप्रदाय आत्मकेंद्रित लोलुपताओं के चलते, अनीति का प्रयोग हिंसा, द्वेष, और विघटन के प्रसार हेतु कर रहें हैं और इसे धर्म का मार्ग कह अपनें समुदायों को भ्रमित भी कर रहें हैं।

विद्या के अभाव में जन-साधारण इस धार्मिक एवं राजनीतिक षड्यंत्र को समझने में स्वयं को असमर्थ पा रहा है। भारत में, अज्ञानता के रहते सम्प्रदायिक महत्वकांक्षाओं को धर्म मान प्रतिवर्ष हज़ारों निर्दोष साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं।

इस सृष्टि को आवश्यकता है ज्ञान की, धर्म की, सम्प्रदाय की नहीं। धर्म कहता है, जो अपने अनुकूल न हो ऐसा व्यवहार दूसरों से नहीं करना चाहिए। सम्प्रदाय इसके विपरीत अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति हेतु दूसरों का अहित करने में भी संकोच नहीं करता।

बीसवीं शताब्दी में भी, हम उन्हीं पुरानी साम्प्रदायिक कुरीतियों और मान्यताओं में, उलझे हुए हैं। आज मानव धर्म का नाश कर, साम्प्रदायिक ईश्वर की रक्षा हेतु तत्पर है।

श्री कृष्ण महाभारत में कहते हैं:

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।

अर्थात् जो धर्म को मारता है, धर्म उसका नाश कर देता है और जो धर्म की रक्षा करता है धर्म उसकी रक्षा करता है।

जो धर्म नहीं है वो अधर्म है, शाश्वत धर्म के लक्षण अहिंसा, विद्या, क्षमा और शांति हैं। सांप्रदायिक स्वार्थ हेतु हिंसा, क्रोध, असत्य और अमैत्री अधर्म है।

धर्म का यह क्षय विश्व प्रगति में रोधक है, जो उन्नति जन-कल्याण हेतु न हो वो अवनति है।

अधिकांश जन-साधारण, अज्ञानता एवं स्वार्थ के वशीभूत हो धर्म की हो रही हानि के लिए उत्तरदायी हैं। शेष जो ज्ञानी हैं परंतु मौन हैं, उनका अपराध और भीषण है। 

श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं:

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे

अर्थात्  गुणीजन की रक्षा के लिये और पाप कर्म करनेवाले दुष्टों का नाश करने के लिये एवं धर्म की स्थापना के लिये मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।

स्मरण रहे, ईश्वर का एक रूप प्रकर्ति भी है और उसका कोप कितना भयावह होता है, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। फैलती महामारी, ग्लोबल-वार्मिंग, निरंतर आते भूकंप इत्यादि, प्रकर्ति के क्रोध का जीवंत स्वरूप हैं। धर्म से विमुख हो जो व्यक्ति सांप्रदायिक आस्थाओं का चयन करता है प्रकर्ति उसका विनाश कर देती है।

मेरे विचार में, हमें सदा आशावादी रहना चाहिए, यही जीव आधार है, आरंभ कहीं से भी हो सकता है, आवश्यकता है तो महत्वकांशाओं और स्वार्थ से ऊपर उठ धर्म का उद्देश्य समझने की और उसका पालन करने की।

अंत में प्रश्न वही है, धर्म क्या है? मेरे अनुसार उत्तर भी सरल है, जो गुण जन कल्याण हेतु धारण करने योग्य हो, धर्म है...



--विव
(विवेक शुक्ला)

Sunday, September 6, 2020

शिक्षा प्रणाली में विद्या का अभाव | Shiksha Pranali Mein Vidya Ka Abhav




शिक्षा प्रणाली में विद्या का अभाव | Shiksha Pranali Mein Vidya Ka Abhav 




शिक्षित होना हमारे व्यक्तित्व विकास के लिए आवश्यक है, छात्रों में बढ़ती प्रतिस्पर्धा इस दिशा की ओर संकेत भी देती है। सारांश में कहें तो शिक्षा प्रणाली के अनुसार अंक प्रतिशत छात्रों की विद्वता का सूचक है और यही वो मानक है जो छात्रों के भविष्य को रेखांकित करता है।

परंतु क्या यह मानक सच में विद्वता को रेखांकित करने में समर्थ है? यदि है, तो प्रतिवर्ष छात्र आत्महत्याओं में बढ़ता प्रतिशत किस ओर संकेत दे रहा है। यदि नही, तो क्या यह कोई भ्रम है जो छात्रों को चिंता का मार्ग दिखा जीवन राह से भटका रहा है? इस प्रश्न का उत्तर अत्यंत जटिल है।
 
एक प्रश्न और है, वह सत्य में आपको विचलित कर सकता है कि हमारे शिक्षण स्थानों में शिक्षा का तो स्तर है पर क्या विद्या का भी कोई स्थान है?
 
यदि है, तो मूलतः उसका कोई प्रतिबिंब हमें आजकल बच्चों के आचरण में क्यों नहीं दिखता। यदि नहीं, तो हम शिक्षालय को विद्यालय कह कर अपनी अज्ञानता का प्रसार क्यों करते हैं। हम शिक्षित जनों को विद्वान कहने में संकोच क्यों नही करते और यदि वो विद्वान हैं तो विद्वता कहाँ है?
 
समस्या का समाधान करना है तो सर्वप्रथम समस्या को पूर्णतः समझना आवश्यक है। बिना परिप्रेक्ष्य समझें हम निवारण हेतु प्रयत्नशील नहीं रह सकते यह मानव प्रवृत्ति है।
 
मूल प्रश्न यह है कि शिक्षा क्या है? यदि यह विद्या नहीं तो विद्या क्या है? और यदि, साधारण जीवन में शिक्षा का अभाव नहीं है तो विद्या का बोध और अनुसरण क्यों आवश्यक है?
 
शिक्षा को यदि हम परिभाषित करें तो यह लिखित एवं भौतिक ज्ञान है, यह वो प्रतिलिपि अथवा जानकारी है जिसका अनुसरण कर हम और हमारी सभ्यता आधुनिक उन्नति और प्रगति की दिशा में निरंतर बढ़ती है। भारतवर्ष में होती उन्नति एवं प्रगति हमारे बीच में बढ़ते शिक्षा स्तर का परिचायक है।
 
हमारे समाज में अधिकांश जनों के लिए यह उन्नति ही जीवन आधार है, उनके लिए ये ही मानवता और सभ्यता के निरंतर अग्रसर होने का सूचक भी है। तो फ़िर, विद्या का स्थान ही कहाँ रह जाता है, यदि इसकी आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती है?
 
हम शायद यह भूल जाते हैं कि यदि शब्द ज्ञान ही मानवता का परिचायक होता तो इस सृष्टि को कभी विद्वता की आवश्यकता ही न पड़ी होती।
 
विद्या को यदि हम परिभाषित करें तो पायेंगे कि यह जीव मुक्ति का आधार है। इस के आभाव में सदाचार, मानवीय कर्तव्यों, आत्मबोध, संस्कार, जीवन के उद्देश्य, सही गलत के मध्य भेद कर पाना संभव ही नहीं।

शिक्षा हमें प्रगति और जिज्ञासा तो देती है, परंतु चिंता, अहंकार और तामस प्रवृत्तियों से भी भर देती है। विद्या मन को स्थिर रख मुक्ति की राह उद्घोषित करती विभा है, यह चिंता, अंधविश्वास और अहंकार को हर लेती है।
 
यह अपने प्रकाश से मनुष्य के भीतर नव ऊर्जा का संचार और जीवन के उद्देश्य के प्रति जागरूकता का बीज रोपित भी करती है। विद्या के अभाव में मनुष्य किसी भी ज्ञान को अर्जित कर लेने के पश्चात भी मस्तिष्क से पशु ही रहता है।
 
हमारे वेद, पुराण और यहाँ तक की पंचतंत्र की कथाएं, विद्या का अगाध स्रोत हैं। उदहारण स्वरूप: कृष्ण-सुदामा की कथा, दधीचि का त्याग, दानवीर शिबि, हरिश्चन्द्र और कर्ण की गाथाएं, सावित्री-सत्यवान कथा, चार विद्वानों की शेर को जीवित करने की कथा इत्यादि सभी हमें सही गलत का भेद करने में सहायक हैं और जीवन उद्देश्य एवं जन कल्याण की राह भी दिखाती हैं।
 
आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो शिक्षा प्रणाली के अंक प्रतिशत मानक के कारण छिड़ा रण छात्रों में मूलतः चिंता और संताप भर रहा है। विद्या के आभाव में केवल शिक्षा के मद में झूमता युवा अपनें कर्तव्यों से विमुख हो केवल अतिउन्नति की दिशा में अग्रसर है। इसके परिणाम स्वरूप भारतवर्ष में बढ़ती आत्महत्या की दर, असहिष्णुता, वृद्धाश्रम, धर्मगुरुओं और राजनेताओं का बिन आंकलन समर्थन, धर्मों के बीच बढ़ता विवाद इत्यादि इसी उद्देश्य हीन व्यक्तित्व का प्रतिबिंब मात्र है। इतना ही नहीं प्रकृति और वायु में घुलता गरल, ग्लोबल वार्मिंग इत्यादि भी कर्तव्य विहीन इसी आधुनिक उन्नति के परिणाम हैं।
 
इस असामाजिक अराजक उन्नति का उत्तरदायित्व केवल शिक्षा प्रणाली के कंधों पर रखना भी उचित नहीं है। स्मरण रहे, शिशु के पहले शिक्षक और गुरु दोनों माता पिता होते हैं। हम सब और हमारा समाज देश को इस स्तिथि में लाने के लिए बराबर के उत्तरदायी हैं।
 
हमारे भारतवर्ष ने शिक्षा दर में उन्नति की है अब समय है शिक्षा प्रणाली में विद्या को शिक्षा के समान अधिकार देने का, अंततः विद्या और शिक्षा का समावेश ही सही मायनों में हमारे युवाओं को दिशा दिखायेगा, जिसके फलस्वरूप हमारा देश जन कल्याण और मानव प्रगति के मार्ग पर अग्रसर हो सकेगा।
 
विद्या का अनुसरण कर ही प्रकृति का संतुलन बना रह सकता है, अन्यथा यह आधुनिक विकास आध्यात्मिक गुणों के अभाव में सृष्टि का पूर्णतः नाश करने में समर्थ है।


--विव
(विवेक शुक्ला)



Sunday, August 30, 2020

Kam Gaurav Ki Baat Nahin | कम गौरव की बात नहीं





Kam Gaurav Ki Baat Nahin | कम गौरव की बात नहीं


गिरि हिला, सिंधु संग नभ काँपा
भयभीत हुयी धरणी उस दिन
निर्भय, निश्चल, मुस्काता सा
वो पंथी चला, कुछ अविरल हो
यह कम गौरव की बात नहीं ।

भीषण विप्लव औ' अंधकार
भयलीन शशि, खद्योत का क्षय निश्चित
निर्भीक, निडर, गुर्राता सा
वो पंथी  चला, निज दिनकर बन
यह कम गौरव की बात नहीं ।

विधि क्रम से जो दीन हीन
धूल धूसरित वस्त्र उसके मलिन
कृषक, सृष्टा का सहभागी
वो पंथी चला, कुछ अर्पण कर
यह कम गौरव की बात नहीं ।।

--विव


Sunday, August 23, 2020

प्रेम | Prem

 



प्रेम | Prem


प्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,
इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।

तुम राधा सी निश्छल काया मुझमे कृष्ण सा प्रेम भरा,
इस गीत रहित, निर्जीव अधर को मुरलीधर करने आयी हो।

तुम चिर वर्षा मैं चातक पर मेघों का आभाव यहाँ,
इक आशा, इस दुर्गम मरुथल पर बदरी बन कर छायी हो।

तुम द्रवित नीर मैं प्यासा पर कठुर घाम में ठोर कहाँ,
इस निठुर, खलित अकाल में टूटी गागर भरने आयी हो।

प्राणप्रिये तुम हो दीपक तम को हरने तुम आयी हो,
इस काल ग्रसित व्यथित मन मे उजियारा करने आयी हो।।


--विव

जीवन पथ तो इक संघर्ष | Jeevan Path to Ek Sangharsh




जीवन पथ तो इक संघर्ष | Jeevan Path to Ek Sangharsh


कौन रहा है चिर काल तक कौन रहेगा
केवल धूमिल स्मृतियां रह जाती
बैठे झर झर नीर बहाते, लाज ना आती
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

क्या लाये थे जो खोया है
व्यथित किस ताने बाने में
संशय छोड़ो, कर्मों का आह्वान करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

टूट गए हो इक गलती में
जीवन को बस इतना जाना
गिरना तो नियति है, उठो, सुधार करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।

दारुण निशा, संकट है भारी
तम में तमचर राह जोहते
निर्भय हो प्रस्थान करो
जीवन पथ तो इक संघर्ष।।

--विव

प्रेम अब निश्चित नही है | Prem Ab Nischit nahi hai

 



प्रेम अब निश्चित नही है | Prem Ab Nischit nahi hai


प्रिये निश्चिन्त हो कर जग बसाओ
किंचित ना बूझो ये कहानी
अंतिम विनय है भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

पाषाण हृदय रोता नही है
क्यों खड़ी संशय में हो
ना संकोच खाओ, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

पत्र जो तुमने लिखे थे
कर दिये अग्नि समर्पित
होम उनका हो गया, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।

बंधन मुक्त कर दिया है
क्यों फंसी मझधार में हो?
यूँ ना ग्लानि बोध खाओ, भूल जाओ
प्रेम अब निश्चित नही है।।

--विव

क्षमाप्रार्थी | Kshamaprarthi





 क्षमाप्रार्थी | Kshamaprarthi

बिना वजह अब तुमसे मैं संवेदना नही दिखाऊंगी,
सच तो यह है कि तुमको मैं लाचार देख न पाऊंगी
अब समय आ गया है जब तुमको सम्मान से जीना सिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

एक धूमिल सी स्मृति है जब मैं उंगली थामे चलती थी,
फिर हाथ छोड़कर भी तुमने, मुझ मे विश्वास दिखाया था,
समय आ गया है जब दूर खड़ी होकर, तुममें भरोसा वही जगाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

याद है अब भी जब तुमने रंग कई दिखलाये थे,
फिर एक दिन तुमने साथ बैठकर उनका मोल बताया था,
समय आ गया है जब मैं तुमको जीवन के रंग नए दिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

हल्का सा कुछ याद है मुझको जब तुमने मेरे आंसू पोछे थे,
फिर एक दिन तुमने मेरा कठिनाई से द्वंद कराया था,
समय है वो जब मैं तुमको मुश्किल में हंसना सिखाऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

धुंधला सा स्मरण है जब मेरा खुद से विश्वास डगमगाया था,
तब तुमने मेरा हाथ पकड़कर थोड़ा सा हड़काया था,
अब वक्त आ गया है, तुमको वैसे ही हड़काऊंगी,
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।

गलत समझना ना तुम मुझको , मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगी,
बूढ़े हो कमज़ोर नहीं, तुमको यह एहसास कराऊंगी,
जब तुम होगे एकाकी पथ पर, नेपथ्य से साथ निभाऊंगी
क्षमाप्रार्थी हूँ पर मैं बुढ़ापे की लाठी ना बन पाऊंगी।


कोख | Kokh





कोख | Kokh


देखो न माँ आज खुशियों ने कुंडी सी खटकाई है,
तुझसे मिलने दूर देश से नन्ही परी एक आई है,
मैंने सोचा मुझसे मिलकर तुम बहुत अधिक हर्षाओगी,
मुझको अपनी गोद मे पाकर फूली नही समाओगी।

मैंने सोचा तुमसे मिलकर मैं तुमको थोड़ा सा सताऊंगी,
और कभी फिर तुमसे छिपकर दूध मलाई खाऊँगी,
जब मुझको डाटोगी तुम तब रूठूँगी इतराउंगी,
फिर चुपके से तुमसे लिपटकर तुम संग मैं सो जाउंगी।

पापा के संग मैं भी एक दिन सब्जी मंडी जाउंगी,
और वहां से झोला भरकर सेब संतरे लाऊंगी,
झोला फटा देखकर मेरा उनको गुस्सा आएगा,
मीठी सी मुस्कान बिखेर तब उनको मैं मनाऊंगी।

पर माँ पापा अब मामला इससे  इतर कुछ लगता है,
बेटी हूँ मैं तेरी पर मुझको तुमसे डर कुछ लगता है,
आज लड़की होने की कीमत फ़िर शायद मैं चुकाउंगी,
क्या एक बार फिर कोख में ही मारी जाउंगी ??

Saturday, April 20, 2019

रमन का शीतल प्रेम | भाग- 1 : अंतर्विरोध और दिशा | Raman ka Seetal Prem | Chapter- 1: Antar Virodh Aur Disha





रमन का शीतल प्रेम 

भाग- 1
अंतर्विरोध और दिशा 


दृश्य 1:


रवि की माँ:  रमन आया था।
रवि:  रमन ! कौन रमन?(वो सर खुजलाते हुए बोला)
माँ:  तेज़ स्वर में रमन का चित्रण प्रस्तुत करते हुए, वही तेरा काला दब्बू दोस्त, सावित्री का लड़का।
रवि:  अच्छा वो! वो मेरा दोस्त नही है, बस साथ क्लास में पढ़ता है (वो मुस्कुराते हुए बोला)
माँ:  हाँ वही, पूछ रहा था तुझे।
रवि:  अरे पर उस गधे को मुझसे क्या काम?(उसने उत्सुकता के साथ सवाल किया)
माँ:  दो दिन से बीमार था, इसीलिए कॉलेज नही जा पाया। शायद नोट्स चाहिए उसको।(इस बार माँ का स्वर गंभीर था)
रवि:  (खिलखिलाते हुए)  मुझे समझ जाना चाहिए था कि पढ़ाई के अलावा उस बेवकूफ़ को क्या काम होगा मुझसे।


अगला दृश्य:

सावित्री! अगर रवि की माँ के शब्दों में कहें तो हाँ वही काले से दुबले-पतले रमन की माँ सावित्री।
एक अधेड़ उम्र की गरीब पर सिद्धांतो पर अडिग विधवा, जो हर रोज़ घर-घर जाकर काम करती है और उससे अपना और अपने एकलौते बेटे की पढ़ाई का ख़र्च उठाती है। उसकी बातों पर मत जाना, वो एक सुदृढ़ और आत्मविश्वास से भरी महिला है, पर उसके बालों की सफेदी और माथे पर पड़ी सिलवटे उसके दर्द को खूब बयाँ करती हैं, वो कभी रोती नहीं है और अपना दर्द किसी से साझा भी नही करती। उसे शायद अपने बेटे की फ़िक्र है, उसे मज़बूत रहना होगा ,वो कमज़ोर नही पड़ सकती। कहते हैं जब आँखों का पानी सूख जाता है तो दिल में कई ज्वालामुखी फटते हैं, पर उनकी आहट नहीं होती। आप शायद वो दर्द नही समझ सकते पर यूँ भी है, कि वक़्त सब कुछ समझा देता है, वक़्त आने पर आप भी समझ जाओगे।

रमन:  माँ ओ माँ आज दिन की थोड़ी सी बूंदाबांदी में घर की छत चू रही थी अब तो बरसात का मौसम भी सामने हैं जाने क्या होगा कुछ बच्चे ट्यूशन पढ़ाने को भी कह रहे थे, आपकी आज्ञा हो तो उनको ट्यूशन पढ़ा दूँ, कुछ पैसे तो मिल ही जाएंगे। (घबराये हुए स्वर में जिज्ञासा के साथ रमन फुसफुसाया)

रमन सांवला पर गहरे नयन नक्श के साथ कम बोलने वाला लड़का अंतर्विरोधों में घिरा, उसकी लंबाई तकरीबन 5'8 और उम्र 18-19 होगी। हाँ, शायद कुछ भी तो खास नहीं है उसमें, पर कहते हैं ना कमल कीचड़ में ही खिलता है। सावित्री का बेटा है, कम बोलता है, हिम्मतवाला है, कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं करता। वह बी.अस.सी सेकंड ईयर का एक उज्जवल छात्र है, उसका शायद कोई दोस्त भी नहीं है, बात ऐसी है गरीबों से अक्सर लोग दूरी बना लेते हैं। पर अच्छा भी है ,मोहल्ले के वह उद्दंड, फूहड़, गंवार, अगर उनकी दोस्ती रमन को मिल भी गई होती तो उसका नुकसान ही हुआ होता।

सावित्री : (रमन को समझाते हुए गंभीर स्वर में ) तू क्यों परेशान होता है, तेरे तो इम्तिहान भी पास हैं, तू केवल पढ़ाई पर ध्यान लगा। मैं दो-चार घर और काम कर लूंगी , ठीक हो जाएगी छत। यह पहली बार नहीं है, बाकी ऊपरवाला सब देख रहा है। 


अगला दृश्य:

(मोहल्ले के उज्जड़ लड़के आपस मे फुसफुसाते हुए)
पहला लड़का: अरे वह आ रही है ,बाल ठीक कर।
दूसरा लड़का: चल पीछे हट, तेरी भाभी है वो।
पहला लड़का: अबे चल उसको देख और फिर खुद को।
तीसरा लड़का:  आपस में लड़ मरो सब।
मोहल्ले के फूहड़ शीतल को देखकर अक्सर ही बौरा जाया करते थे, और वह! वह कौन सी कम है, आशिकों का जनाज़ा निकालने का हुनर कोई उस कातिल से पूछे।

शीतल ! अर्द्ध चंद्र ग्रहण में फैली दूधिया चांदनी सा रंग, गदरीला बदन , सुडौल कद काठी , नयन ऐसे कि शायद मछली को भी शर्म आ जाए। होंठों में समाई कमल से भी दिलकश मुस्कुराहट, वाकपटु ,चपल, सकल ऊर्जा से भरी किसी देवी की प्रतिमूर्ति प्रतीत होती है। सूट के ऊपर जब वह लाल दुपट्टा लेती है, तो शायद "मोहिनी" शब्द से उसको सुसज्जित करना भी पर्याप्त ना होगा।


अगला दृश्य:

शीतल उसी मोहल्ले में रहती है जिसमें कि हमारा रमन। अचरज की बात यह है कि दोनों कॉलेज की एक ही क्लास में पढ़ते हैं और आपस में ना कोई बात है ना ही कोई चीत। शायद आपको पता है कि नहीं शीतल चाहे पूरे कॉलेज और मोहल्ले के लिए हूर हो , पर नूर वह केवल अपने शरीफ़ रमन की आंखों में है। हाँ, आप ठीक समझे, हमारा रमन दिल ही दिल में शीतल को चाहने लगा है। बेवकूफ़ी की इंतहा यह है कि वह कॉलेज से घर आने के बाद कम से कम 5-6 बार साईकल से शीतल के घर के चक्कर लगाता है और उसको शक ना हो इसलिए कभी खाली बोरी, कभी टीन, कभी बर्तन पीछे रख लेता है, जैसे कि घर का कोई काम करने जा रहा हो। अब दिन में तो माँ होती नहीं इसलिए चोरी पकड़े जाने के आसार कम है। शीतल की एक झलक पाने के लिए कोई बहाना ना मिलने पर इस भोले भंडारी को मोहल्ले के फूहड़ लड़कों को भी साइकिल में पीछे बिठा कर घुमाने से कोई परहेज नहीं है। शीतल शायद ये जानती है और शायद नहीं भी जानती क्योंकि इस सीधे-साधे बेहद ही आम दिखने वाले गरीब लड़के में उसकी कोई रुचि हो भी तो क्यों हो?

पढ़ाई में अब रमन का मन नहीं रमता। उसको किताबों में अब शीतल दिखाई देती है और जब नहीं दिखती तो वह साइकिल लेकर शीतल के घर की ओर निकल जाता है। अब रमन का लक्ष्य पढ़ लिखकर घर को संभालना नहीं बल्कि "शीतल एक खोज" बन चुका है। उसको यह भ्रम है कि माँ कुछ नहीं जानती पर शायद वह अपनी माँ को अभी कम जानता है। उसका बदलता वार्तालाप का ढंग और आदतें माँ को बहुत हद तक आगाह कर देती हैं, माँ इस दौर से गुजर चुकी है और सब जानती है पर अभी वह वक्त नहीं आया कि वह रमन को असहज करे और उसका मार्ग दोबारा से प्रशस्त करे, वह चाहती है कि रमन खुद समझे क्योंकि यह ना रमन की पहली चुनौती है और ना ही आखरी।



अगला दृश्य:

पढ़ाई लिखाई में अब रमन पिछड़ने लगा है। क्लास में रहते हुए भी उसका ध्यान केवल शीतल पर रहता है, पर वह अपने दायित्वों और मजबूरियों को खूब जानता है। अब ऐसे में वह शीतल से कहना तो चाहता है पर मन ही मन अंतर्विरोधों से घिरा हुआ है, उसको नतीजे का आभास है और वह अपनी सीमाओं को भी बखूबी जानता है।

हेड मास्टर साहब उसको और सावित्री को जानते हैं, वो रमन के अंतर्द्वंद से तो अनभिज्ञ हैं पर उसके गिरते पढ़ाई के स्तर को लेकर बेहद चिंतित हैं। दिन प्रतिदिन रमन को अपने सवालों पर बार-बार निरुत्तर होते देख उनसे न रहा गया।

हेड मास्टर (झुँझलाकर) : क्या विचार है? जिंदगी में कुछ करना है या यूँ ही आवारागर्दी में गर्दिश के साथ दिन काटने हैं अपने बारे में नहीं तो अपनी माँ के बारे में तो सोंचो उसकी बहुत उम्मीदें हैं तुमसे।

सारी क्लास ठहाके लगा रही थी। रमन जहर का घूंट पीकर रह गया, आज उसको हेड मास्टर जी द्वारा कही गई बात कांटे की तरह चुभ रही थी। पर इस गुमनाम प्रेम ने शायद उसे दिशा विहीन कर दिया था। उस बावरे को गुस्से में भी इस बात का संतोष था कि जब सब मदहोश थे तब शीतल गंभीर और अधीर लग रही थी...



** शेष **


-विव 
(विवेक शुक्ला)

Saturday, December 1, 2018

Letter to MJ(Wife), Breaking Stereotype

Dear MJ,

The best thing happen to me is to born & brought up in my family but that's not my decision i.e. by God Grace. Indeed, I can take credit of the next best thing happened to me & that's selection of you as my life partner. Let's brutally honest about myself, I was restless with lots of ideas but less in patience to understand, how to get them executed? 
I was searching for stability in my life & in turn messing it all up. Thanks to you for letting me understand that "a good meaningful life is like climbing a mountain only having up & down's with no stable surface, searching stability in life is no different than dropping from mountain to a valley i.e. running away from life".
I am having no shame in calling you my better half as you indeed is my better half. I was nobody in past and truly I am nowhere close to perfection now but whatever little I am able to achieve today in my personal or professional life is because of you & parents, you provided me that confidence, I don't have to worry much about anything other than my ideas & work. I know & I believe that you will take care of everything else like day to day obstacles within the family, food, others expectations, relationships, social life etc. You are that good & that's too you are doing it, without any complain i.e. Unconditional Love. 
You have given your love & respect to my family & accepted it as your own & that is/was acknowledged within the family & everyone admires you. I am also thankful to you for our beautiful naughty son & we both are trying our best to raise him well, although it is not even needed to be put in here but I have too, on that front also you are playing a better role than me.
A relationship is not all about daylight, we also have our dark as well. We fight for even the silliest of the things & later discuss it & have a laugh together. This is the learning curve of life & all that's put together make it meaningful. The striking thing about myself is I am the most eccentric person you ever get & that's too seems to be an understatement but credit to you for still treating it as nothing & keeping it simple & plain.
What I said above is no exaggeration but the complete truth. We both have mutual love & respect for each other. You are doing much more than what I had done for you but that doesn't mean, that I love you or respect you any less, everyone has its own calibre to express & perform, I hope you understand what I mean......
You help me to understand everything can be achieved but with a condition that you have the right state of mind & when you truly believe that you can pull this off.

"Perfection is all about learning & understanding from imperfection. A man is not called a man till the point he is brave enough to acknowledge & understand his shortcomings...


Thank you my better half & lover still, "MJ".............




Your Everloving Stupid Husband
"MS"

Friday, November 9, 2018

Life, Gambling & We the Star

Life, Gambling & We the Star



When life is all about ifs & buts, definitely our life is failing with excuses. It's too simple to understand it, basic funda is to try, fail, learn, understand & then try again. Yes, that's it, it's that simple.

Come on but no one finds it that simple, yes that's right too, simply because most of us don't understand this funda & legends don't care :)

Everyone wants to be a hero in his/her own life & again it is thrilling to have a life just like an action/masala movie. Who wants to watch a "documentary"? Even the "biopics" in today's generation are filled with masala & action. If we are that much allergic to real life movies then how can we accept a dull/plain life?

Of course, we want to treat our life as a movie, in which we are the Star, yes that's right that Bigggg Starrrr...

It's lame, we the star are having problems with the movie script Oops with our life. Now the star within us wants to be a scriptwriter too, yes its mesmerizing to be an allrounder. We need to play with the script/life now, as we want to make our life a thrilling masala movie.

Every then & now we start taking chances & gambling with life is the way to go. 

The only problem it has is the original director, GOD. God doesn't play dice & he even doesn't believe in those, who believe in gambling. The reason is pretty basic to understand, God is 16 Kala Sampurna & doesn't make mistakes. Someone who doesn't commit mistakes, never have the opportunity to learn from them & hence he doesn't understand & if someone doesn't understand obviously will not able to do a favour for us even in case he wants too.

God is more like "Shyam Benegal" & help us with pure movies like "Ankur" or "Bharat Ek Khoj". With all our fantasies we want to make "Sabse bada Khiladi" & seriously its neither his cup of tea & nor he is interested in it. Too many conflicts & god decided to left our movie & in the absence of the director, producers to pull their hands from this project.

Now with all our ego, we are like who cares, I am a star & yes a big starrrrrr...

We are all alone to work in this project/movie but even then we keep our head high as we never compromised with our ideas & fantasies, till the point, we realise that it is not a movie but our life damned & we screwed it up.

Life, Gambling & We the Star

Life is not a dream but a reality & we find it too complex & dark to live with. Now we wish that its all may turn out to be a bad dream & we surely wake up & have that simple life again. As Galib said:

Hazaron Khwahishen Aise Ke Har Khwaish Pe Dum Nikle.. Bahut Niklay Mere Armaan Lekin Fir Bhe Kum Nikle...

With all broken dream & fearing reality, we will find evaporation of our ego & then we finally realise "what is photosynthesis". Now "Khatron Ke Khiladi" become "Ramu Kaka" & instead of conflicting with God using dialogues "Mai tujhse kuch nahi mangta" our newly crowned "Ramu Kaka" will complain "Why me God, why me(Mai he kyunnnnnn)...

"It's God turn & now he will not give a damn to it, he seriously doesn't care. The only kind words which enchant our ears are "you deserve it MF...

But you see once a star is always a star, failing is not final. We have our own excuses for each & everything, again as I said life is all about ifs & buts for a failure.


Life, Gambling & We the Star


Thursday, October 25, 2018

Survival Of The Fittest, Why ??

SURVIVAL OF THE FITTEST




I found this as an interesting topic & it seems to be the ultimate truth of life, but is it actually? Let's try to dig deeper & find out.

Survival # On first look, it reflects the fight for existence, It gives us a healthy feeling of competition. It feels good to fight & to succeed. Its approach is aggressive & of an optimist.

If you look into most of the theories based on life, those theories always come to the conclusion that in this world those survive or exist who are the strongest, fittest, Quickest & sharpest.

One of the most popular theories in Science is Darwin theory. Consider as a Landmark in the "Evolution of Science".

Darwin Theory Conclusion-- Survival of the fittest.

The logic behind Darwin theory-- They have the vision, they have the speed & they have the power.

Is it the ultimate truth? If yes, then the percentage of fittest is less than 1%, then what the rest 99% will do. Most of us are not the fittest, not the quickest, not have that much vision & by no mean the strongest.

If we go by above theory, it is pretty much clear that most of us are not supposed to do things in a big way, we are not supposed to tackle difficult situations & neither supposed to be a part of revolution, which is/will be responsible to force people to think or work in a different way or to change the existing mindset/pursuit.

I respect this theory & I agree that it is partially true but it is not the complete truth. Nature is always fair & square with everyone; Fate doesn't do partiality.

Why these theories always look to one end of the coin, where is the other end? It seems these theories are inspired by Hindi movie Sholay. It looks, the author love to play with Jai coin before practising these theories.

SURVIVAL OF THE FITTEST

Like everyone, I also have my point of views to prove worthy of my words. I completely believe in the story of tortoise & the rabbit, I also firmly believe in the movie named as "Rocky". As per survival theory, portrayed characters on those stories were bound to lose, they supposed to show their back & get the hammering but that never happened. My point of having belief on both of them is not only because they won their respective battles but, also because they were able to overcome their fear/challenges & as underdogs they kept on fighting till the very end irrespective of the odds. Due to all this, they were able to beat those who were Quicker, stronger & sharper than them.

Above reasoning shows, "one who never give up, more often than not wins, Irrespective of the ability of the opponent".

The logic behind my reasoning- Nature is such that nobody in this world is perfect, everyone has their own flaws. The strongest is not the fittest; fittest is not the quickest & true for all other qualities as well. Even the abilities of a genius are limited to a particular trait.

How is it helpful for us rest/average people?  In this competitive life, we need to prepare us as per the best of our abilities & always keep in mind that we need to fight until the very last. We need to believe that even against the people who are very best in their traits, we have our chance.

If we believe on above, what will go to happen?  Everyone will start their respective battle/competition with their strength, you will definitely get the hammering at the beginning against the more stronger opponent but if you keep your never die attitude with you & if you hang on & doesn't lose your focus. Your stronger challenger may get frustrated & may deviate from his strength/game plan & try to do things differently. That will be your chance to try to pull that game in your favour, you will succeed more often than not.

So next time if some of those people don't believe in you. Call you an average/mediocre, don't feel disheartened, just give them a warm smile & prepare for the situation. "Always remember that your actions will always roar louder than your words".

"Existence & survival are not patents to them who are the Quickest, the strongest & not even to them who are the fittest but only those survive/exist who never give up & who actually believes that they can & they will make a difference"



SURVIVAL OF THE FITTEST


It is hard to be a Man, Really ??

Hard to be a Man




As a male child (gender specific), We have born perfectly fine but when we grow with age down the line, we fantasies by the term "Manliness". Unknowingly, the very first thing which comes to our mind in relation to it is we are male; hence we must possess every quality to gain "Manliness". While trying to achieve so, we always keep on adding taboos to it, like man has no fear, man cannot cry/man shed silent tears, man does not show his pain, being manly we must borrow the load of everything, man cannot fail or made mistakes, life is a battlefield & man need to keep on fighting till he won & man is this/that & many more.

Keeping above things in mind, it seems really difficult to be a Man, let’s work on facts:

The man has no fear # It is perfectly fine to have some fear, I am quoting Karna from Mahabharata:

When Shalya(Sarthi of Karna) asked Karna don't you get fear by seeing roar of Arjuna Gandeev(Arc), Karna replied yes I am fearful while seeing Chariot driven by four white horses, Arjuna as fighter, Krishna as his Charioteer but my fear is keeping me conscious, awake & motivating me to fight with the best I have.

Hard to be a Man

Man cannot cry/Man shed silent tears# It is perfectly fine to show off your emotions with your loved ones, once in a while. Keep them beside you, they are the most precious jewel you ever have & they are with you in your thick & thins for a reason. Show them your love & affections & yes your emotions as well. They will motivate you & when two or more brains work together results will come.

Man does not show his pain# You are not built of Iron, you are human & there is nothing wrong in being a human. You can show your pain, the only thing that matters is how you get up & react to it that will seal your fate.

Being manly we must borrow the load of everything# Yes if you are single but if you have a family & you are doing so, then you are fooling yourself. Your parents will always guide you in the right way, you will not go wrong even a bit if you keep listening to their advice. If you are married, your wife will always be your best supporter & your worst critic, you must understand that we called her our better half for some reason, you must share & see the change.

Man cannot fail or made mistakes# it is the biggest joke of the decade, Albert Einstein once said: "A person who never made a mistake never tried anything new". You must do made mistakes to learn & to understand.

Life is a battlefield & Man need to keep on fighting till he won# Yes, life is a battlefield but you must remember that we are human & we have our limits while keeping our self always in switch on mode make us tired/exhaust quickly. We cannot win our life battle in such a way. In order to maintain continuity, we must maintain a balance. We can't keep our self-switched on every time, we have to realize when to switched on & when to switched off & then when to switch on again. We need to enjoy life, we need to see the sunshine, nothing harms to have laughed to crack jokes & to see this beautiful world in relaxing mode.


You need to understand that we are no "16 kala sampoorna" i.e. only Lord Vishnu, We are not the Ironman either. We are humans & our fate is not dependent on taboo like this. Our fate totally depends on how tough we are mentally, how long we resist & how we learn from our failures/experiences, keep faith in your dreams & believe yourself!!


I am aware that now some of you will find, all my reasoning above highly debatable & you might say that I am exaggerating the facts or showing fanaticism over reality but again the word "Manliness" is itself a fanaticism term on its own. At last Be Normal & act as a human!!

Hard to be a Man

I Don't Fear Your Opinion, I Know Who I am

I Know Who I am






Do you ever realize, in our lives, most of the opportunities went unaddressed due to the fact that we are always conscious/fearful about what others will say or react to it? Before moving ahead, let's agree on the fact "fear is not good for success".

It is something which is fed to us, when we are growing as a child. It starts at home with Parents "Sharmaji ke bache dekho kitna padhte hain, ek tum ho cricket se subah aur cricket se shaam, fail hojaoge, Log kya kahenge(LKK), jag hasai karaoge". Same also haunt us during our school tenure when our teachers compare us with other studious students (If we are not top notch) of our class & say see how they are doing & then see how you are doing, "Zindagi me kuch karna hai ya yehi karna hai jo kar rahe ho, apne parents ko kyon dhoka de rahe ho & others in class start whispering, Ganda baccha". If we are good at studies then the fear of expectations (teachers/parents) & what others will say will always be there. The movie named "Taare Zameen Par" is an excellent example. Instances may change but somewhere down the line; it may end up covering the story for everyone.

Down the line, when we grow as an adult, we always have that LKK syndrome playing in the background & now the circumstances will be different. Now we are more conscious about how we look? How we behave? How is it to react like this/like that? What do others think about it? What others say about it? While trying to play safe, we start doing the thing which doesn't come to you naturally & it is obvious that we are not good at it. We start doing mistakes & creating trouble for us & down the line we even go more conscious about these things.

We might be good in singing/dancing/writing/sports & we may be passionate about it but we never seriously tried to have a career on this as if I fail "log kya kahenge, parent’s ke expectations ka kya hoga". So to avoid it, we again play safe with our career & try to have a decent job i.e. Naukri & that is the end of our constructive vision, because at that time we like something else & just to avoid "hard way", doing something which we don't want to do & don't have any vision about it.

Next stage, we grew older as be Man/Woman, We feed the same to our children & they do what is expected of them.

Reading all of you may argue with me that I am exaggerating the facts & dragging it too long. I know everything mentioned above is not applicable to everyone but again by giving multiple examples, I tried to touch maximum individuals I can. It is a generic problem & better to call it a syndrome or taboo. It will make us a different individual all together which we never want to be. Trust me even then other will say what they have too & you will be fearful all your life just because to avoid that altercation.

Some of you may advocate the fact that what is wrong with it? we have a settled life, we are earning good & we also are able to maintain a good work/life balance & tumhare paas koi kaam nahi hai sivaye ungli karne ke. Ok, I have a counter question then, what is the difference between us & animals? they are also doing what is good for their survival & we are no different, just by virtue of looking different do we have the right to call us human? I don't consider it as determining factor. With this attitude, we don't dare to call us as superior species. Our Ancestors not by looks but by creation by innovation by thinking by using their brains, by their daring nature & continuous efforts proven our-self as superior species over others.

Who I am

A few years back, I was no different & faced the same problem; I was reserve & even shy sometimes. It is more to do with consciousness syndrome "LKK" although I was doing good as per whatever expectation I was having that time but somewhere inside I was unwell, I was burning like a volcano, I was flowing like a river but from outside its all normal/safe like a deep ocean at the shore.

During that phase with time I realized "when I am less strained with expectation, I always deliver more". Self-realization is the key, it was the missing link & it will solve most of our problem & kill that "LKK syndrome". One wise man & that's me once said: "Till the time you don't take yourself seriously don't expect from others, think highly of yourself as everyone will believe you if you challenge them to their limits".

Problem is we don't give time to self, we tried to give our opinion in each & everything & conscious about the same from others as well but most of the times we are not brave enough to listen to our inner core. We need to understand our self-first. I always said, "Either you fear or you dare, the choice is always yours". We need to understand "who I am".

I choose the hard way, I decided to check my limits, if I will give a design, It will be without a single flaw, If I have to take a stand for what I believe, I will take, If I want to blog, I will blog, If I want to express feeling in Shayari, I will do Shayari, If I have to do counselling for someone, I will surely do it. What do others think about it? What their opinion is? Or what others will say about it? I couldn't even give damn to it.

I know I am pretty good whatever I am doing & whatever I will do & I will keep challenging myself to check my limits & one thing is pretty sure "Sky is the limit".

We need to understand "If we have some passion, we need to protect it & need to work on it to improve it even better. Others who have any business about it & what they never able to achieve in their life will try to discourage us, try to demotivate us, again the onus is always on us how we take care of our thoughts & how mentally strong we are to deal with it & keep moving forward.

The catch is "always take care of your thoughts, sooner or later you will definitely finish the line as a winner at least in your own eyes".

I always believe, "Time may get tough but I will smile knowing the fact, I am stronger today then I was yesterday & I will be stronger tomorrow then I am today".


I am loving my life, I spend time with me & that is why I am aware who I am :)




Who I am

@Viv Amazing Life

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